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National Breaking: बार काउंसिल और वकीलों की स्ट्राइक गैरकानूनी – प्रोफेसर अश्विन कारिया // न्यायालयों में पेंडिंग पड़े प्रकरणों को लेकर आयोजित हुआ 140 वां राष्ट्रीय आरटीआई वेबिनार

मप्र हाईकोर्ट चीफ जस्टिस द्वारा पेंडिंग मामलों को लेकर जल्दी सुनवाई के आदेश पर वकीलों के लामबंद हड़ताल को लेकर देश के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने रखे विचार।

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दिनांक 26 फरवरी 2023 रीवा मध्य प्रदेश

क्या देश के विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन दशकों पुराने मामले का निपटारा करने में वकील बाधा बन रहे हैं? क्या अभी हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस द्वारा दिए गए आदेश जिसमें उनके द्वारा यह कहा गया कि दशकों पुराने मामलों को प्रतिमाह उठाया जाकर तीन-तीन माह की समय सीमा के भीतर निपटारा किया जाए उचित नहीं है? क्या पूरे देश भर के न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक पेंडिंग पड़े मामलों और निरंतर बढ़ती संख्या को लेकर देश की जनता के प्रति सरकार, न्यायाधीशों और वकीलों की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए? क्या मामलों के जल्द निपटारे से याचिकाकर्ताओं को न्याय नहीं मिलेगा? इन्हीं विषयों को लेकर प्रत्येक रविवार आयोजित होने वाले 140 वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप विशिष्ट अतिथि के तौर पर पधारे गुजरात पालनपुर से लॉ कॉलेज के प्राचार्य अश्विन कारिया, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण पटेल, मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, बैंगलोर कर्नाटक से वरिष्ठ अधिवक्ता एम राघवन, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के संयोजक वेंकटरमन सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कार्यक्रम में अपने विचार रखे।

बार काउंसिल और अधिवक्ताओं की हड़ताल गैरकानूनी – अश्विन कारिया

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पधारे गुजरात पालनपुर से लॉ कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अश्विन कारिया ने बताया कि देश में पेंडेंसी निरंतर बढ़ रही है और न्यायालयों में विचाराधीन प्रकरण लगभग 5 करोड़ से ऊपर पहुंचने वाले हैं। ऐसी स्थिति में देश में नागरिकों को सस्ता, सुलभ और जल्दी न्याय कैसे मिले यह एक विचारणीय बात है। उन्होंने दशकों पुराने पेंडिंग मामलों को लेकर चिंता जाहिर की और कहा कि इसमें सरकार न्यायालय और बार काउंसिल सभी को मिलकर काम करने की जरूरत है। और लोगों को शीघ्र, सस्ता और सुलभ न्याय उपलब्ध करवाए जाने की जरूरत है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस के अभी हाल ही के एक आदेश जिसमें उन्होंने यह कहा कि पुराने मामलों को प्रतिमाह खोला जाकर 90 दिन की समयसीमा के भीतर निपटारा किया जाना चाहिए और जिसके बाद भोपाल सहित आसपास के कई जिलों में जिला न्यायालय और उनके अधीनस्थ न्यायालय के अधिवक्ताओं ने हड़ताल प्रारंभ कर दी है इस विषय पर उन्होंने कहा कि पूर्व में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बार काउंसिल और अधिवक्ता हड़ताल पर नहीं जा सकते और यह उनका लीगल राइट नहीं है। उन्होंने कहा कि बार काउंसिल और अधिवक्ताओं का स्ट्राइक करना पूरी तरह से नियम विरुद्ध और गैरकानूनी है। इससे पूरी न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है और पेंडेंसी आगे बढ़ती जाती है।

कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने पेंडिंग मामलों को लेकर कई पहलुओं पर की चर्चा

इस बीच कार्यक्रम में पधारे अन्य विशिष्ट अतिथियों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने वकीलों द्वारा की जाने वाली हड़ताल को लेकर कहा कि यह पूरी तरह से गैरकनूनी है और उन्हें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जल्दी और सुलभ न्याय दिलवाए जाने में वकील बड़ी बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अधिकतर देश में 90 प्रतिशत केस मात्र 10 प्रतिशत वकीलों को मिलते हैं वहीं 10 प्रतिशत केस 90 प्रतिशत अन्य वकीलों में वितरित होते हैं। ऐसे में जो वकील ज्यादा केस लिए हैं वह चाहते हैं कि मामला लंबे चलते रहें। इसीलिए केसों का निपटारा जल्दी नहीं होने देना चाहते और इस पूरे प्रकरण में मात्र कुछ ही ऐसे अधिवक्ता हैं जो सम्मिलित हैं परंतु दबाव बनाकर निचले स्तर के अधिवक्ताओं को भी इस प्रकार हड़ताल करने और विरोध करने के लिए मजबूर करते हैं। उन्होंने आगे कहा की यदि देश के नागरिकों को सस्ता सुलभ और शीघ्र न्याय दिलवाना है तो वकीलों को वरिष्ठ न्यायालयों के शीघ्र सुनवाई के आदेशों का सम्मान करना चाहिए और उसका विरोध बिल्कुल नहीं करना चाहिए। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ताओं की मंशा पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहा कि कब-कब ऐसा हुआ है जब यही वकील और बार काउंसिल के लोग जनता की भावनाओं के साथ खड़े हुए हैं? उन्होंने कहा कि क्या कभी बार काउंसिल और वरिष्ठ अधिवक्ता इस बात के लिए स्ट्राइक अथवा हड़ताल किए हैं कि आखिर आम जनता को न्याय जल्दी क्यों नहीं मिल पा रहा है और क्यों दशकों पुराने मामले पेंडिंग पड़े हुए हैं?
विषय पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और नेशनल फेडरेशन फॉर सोसायटी फॉर फास्ट जस्टिस के संयोजक और जनरल सेक्रेटरी प्रवीण पटेल ने जल्दी न्याय पर जोर दिया और बताया कि देश में विभिन्न न्यायालयों में बढ़ते हुए प्रकरण चिंता का विषय हैं। उन्होंने न्यायालयों को प्रतिवर्ष आवंटित किए जाने वाले काफी कम बजट पर भी चिंता जाहिर की और कहा कि हम निरंतर वित्त मंत्रालय और सरकार को बजट बनाने के पूर्व कई तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं लेकिन इसके बावजूद भी सरकार द्वारा न तो इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है और न ही जजों की नियुक्ति की जा रही है जिससे जल्दी न्याय कैसे मिल पाएगा यह अपने आप में बहुत बड़ा प्रश्न है। ग्राम न्यायालय, विधिक सेवा, पैरा जुडिशल वालंटियर जैसे कई मामलों पर उन्होंने खुलकर बात रखी और कहा की कानूनी पढ़ाई से लेकर संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा ने कहा की सरकार और कोर्ट को वकीलों की समस्या को भी देखना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि हर तरफ नकारात्मक माहौल है और वकीलों की समस्या यह है कि क्योंकि उनकी भी बात को सुना नहीं आता इसलिए वह स्ट्राइक पर जाते हैं। हालांकि नित्यानंद ने अच्छे सुशिक्षित वकील, न्यायाधीश और कानूनी शिक्षा को बेहतर बनाए जाने और निरंतर ट्रेनिंग दिए जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि देश में जल्दी, सस्ता और सुलभ न्याय सभी को मिले इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की। उन्होंने कहा कि कोर्ट केस में पेंडेंसी का कारण मात्र वकील नहीं है बल्कि इसके पीछे न्यायालय और सरकार स्वयं ही जिम्मेदार है। नित्यानंद ने कहा कि हाईकोर्ट की बात करें तो वहां पर दशकों से मामले पेंडिंग पड़े हुए हैं जिसमें आज तक सरकार के द्वारा समय पर जवाब तक प्रस्तुत नहीं किए गए हैं यह सब काफी चिंता का विषय है।
इसी प्रकार कार्यक्रम में फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के संयोजक वेंकटरमण ने भी कहा कि सभी को सुलभ और जल्दी न्याय मिले इसके लिए हम निरंतर प्रयास कर रहे हैं और अपनी संस्था के माध्यम से भी सरकार को आगाह करते रहते हैं। बेंगलुरु कर्नाटक से वरिष्ठ अधिवक्ता एम राघवन ने भी विषय पर अपने विचार रखे और उपस्थित प्रतिभागियों के प्रश्नों के जवाब भी दिए।
कार्यक्रम में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर छत्तीसगढ़ से कार्यकर्ता देवेंद्र अग्रवाल ने भी प्रश्न खड़े किए और कहा कि पुलिस एफआईआर दर्ज कर अपनी जवाबदेही से फुर्सत हो जाती है और आईपीसी, सीआरपीसी और सीपीसी के तहत कार्यवाही नहीं करती है। उन्होंने धारा 439 और 482 के तहत हाईकोर्ट में लगाई जाने वाली याचिकाओं पर अपनी आपबीती सुनाते हुए अपने विचार रखे और कहा कि कोर्ट मामलों पर सही तरीके से संज्ञान नहीं लेती हैं जिसकी वजह से मामले ट्रायल में चले जाते हैं। देवेंद्र अग्रवाल ने कहा कि कोर्ट को याचिकाकर्ता के तथ्यों को भी सुनना चाहिए और निपटारा करना चाहिए।
कार्यक्रम में कई प्रतिभागियों ने अपने सवाल किए जिनमें नरेश कुमार सैनी, राहुल अरोरा, केएस तालेकर, सोमशेखर राव, जयपाल सिंह, सत्येंद्र सिंह चौहान आदि सम्मिलित रहे।
कार्यक्रम का संचालन एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह, आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप के आईटी सेल के पवन दुबे के द्वारा किया गया।

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National Breaking: सांसदों विधायकों की संपत्ति बढ़ोत्तरी को लेकर विशेषज्ञों ने रखी राय, ADR संस्था के रिसर्च रिपोर्ट को लेकर हुई चर्चा,139 वें राष्ट्रीय RTI वेबीनार में जगदीप छोकर और विपुल मुद्गल ने रखे विचार

बिना किसी सोर्स के संपत्ति बढ़ोत्तरी की जांच की उठी मांग।।

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दिनांक 19 फरवरी 2023 रीवा मध्य प्रदेश।

अभी हाल ही में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ए डी आर नामक संस्था द्वारा पब्लिश शोध आर्टिकल की रिपोर्ट ने देश में बार पुनः भूचाल ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद जब से सांसदों और विधायकों की संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक किए जाने का प्रचलन प्रारंभ हुआ इसके बाद इनकी संपत्तियों में बढ़ोतरी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई है। इसी विषय पर 139 में राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार में चर्चा हुई जिसमें कई वरिष्ठ सामाजिक क्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्तियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से एडीआर संस्था के प्रमुख जगदीप छोकर, कॉमन कॉज के डायरेक्टर विपुल मुद्गल सहित सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण पटेल एवं रीवा से प्रोफेसर उत्तम द्विवेदी के साथ पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप डीएल चावड़ा सम्मिलित रहे।

71 सांसदों की सम्पत्ति में 286 फीसदी का उछाल

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की हाल की रिपोर्ट के अनुसार कई सांसदों की संपत्तियों पर गैर अनुपातिक ढंग से इजाफा हो रहा है। हालांकि इस इजाफे के पीछे क्या कारण है यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के प्रमुख जगदीप छोकर ने बताया कि सांसदों की संपत्तियों में बढ़ोतरी से स्पष्ट है कि जो सांसद चुनाव जीते हैं उनकी संपत्तियों में तो इजाफा होता है लेकिन जो हार रहे हैं उनकी संपत्तियों में कोई विशेष इजाफा नहीं होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि कहीं न कहीं चुनाव जीतने और पद प्राप्त करने के उपरांत उसके प्रभाव की वजह से उनकी संपत्ति में इजाफा हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जो सांसद एक बार चुनाव हार जाते हैं और पुनः चुनाव जीत रहे हैं तो हारने के दौरान उनकी संपत्तियों में इजाफा नहीं होता लेकिन अगली बार जब चुनाव जीत जाते हैं तो उनकी भी संपत्तियों में इजाफा होता है। इस प्रकार सांसदों का चुनाव जीतना और सांसद अथवा मंत्री बनना सीधे-सीधे उनकी संपत्तियों में इजाफा के समानुपाती है। उन्होंने बताया कि संपत्तियों में होने वाला इजाफा उनके किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान की वजह से नहीं हो रहा इसलिए यह स्पष्ट नहीं है की यह इजाफा किस प्रकार का धन है और कहां से आ रहा है? इसी प्रकार कई मुद्दों पर जगदीप छोकर ने अपने विचार रखे और कहा की चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए और अच्छी छवि वाले लोगों को लाना पड़ेगा। 

एडीआर कि उक्त रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ कि 71 सांसदों की सम्पत्ति में 286 फीसदी का उछाल हुआ है और इसमे मध्यप्रदेश के गणेश सिंह सहित 5 सांसद शामिल हैं। ADR की रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक की सम्पत्ति में 17.59 करोड़ का इजाफा हुआ है।

पार्टियां धनी और बाहुबली लोगों को टिकट देती है

कार्यक्रम में कॉमन कॉज से पधारे सीईओ और डायरेक्टर विपुल मुद्गल ने कहा कि आज की परंपरा में पार्टियां ऐसे लोगों को टिकट दे रही है जो आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति होते हैं। उसके बाद भी जो ऐसे लोग हैं जो दबंग और जिनका क्रिमिनल रिकॉर्ड होता है उनको भी प्राथमिकता दी जा रही है। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि आज राजनीतिक दल नैतिकता को छोड़कर पूरी तरह से चुनावी दंगल में ऐसे व्यक्तियों की तलाश में है जो साम-दाम-दंड-भेद से उन्हें चुनाव जीता सकें। विपुल मुद्गल ने बताया कि एडीआर और कॉमन कॉज दोनों ने मिलकर इलेक्टोरल बांड पर भी सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई हुई है जिस पर सुनवाई चल रही है। विशेषज्ञों ने कहा कि जो व्यक्ति टिकट पा रहा है और जिसके द्वारा टिकट दिया जा रहा है उसमें टिकट दिए जाने वाला व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता और टिकट प्राप्त कर चुनाव जीतने वाले व्यक्ति उस टिकट देने वाले व्यक्ति के प्रति ज्यादा निष्ठा रखते हैं और जनता के प्रति उनकी निष्ठा कमजोर हो जाती है। इसलिए पूरा तंत्र इस प्रकार काम कर रहा है कि व्यक्ति टिकट कैसे पा रहा है और टिकट उसे कौन दे रहा है। इस बात पर जोर नहीं रहता है कि जिन मतदाताओं ने उन्हें वोट दिया उनके प्रति उनकी निष्ठा बनी रहे। इसीलिए टिकट प्राप्त करने के बाद धन की गैर अनुपातिक तरीके से वसूली का रास्ता साफ हो जाता है और हर कोई इसी बात पर जोर देता है कि कैसे उन्हें धन प्राप्त हो क्योंकि इसके पहले उन्होंने चुनाव में काफी धन लगाया होता है।
विपुल मुद्गल ने बताया कि मात्र एक चुनाव में लगभग 8 बिलियन डॉलर खर्च होते हैं। और यदि सभी चुनावों को देख लिया जाए तो यह खर्च 30 से लेकर 35 बिलीयन डॉलर तक हो जाता है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है यह खर्च किया जाने वाला पैसा कहीं न कहीं जनता से ही निकाला जाएगा। इस प्रकार चुनावों में अकूत संपत्ति लगाया जाना भी प्रतिबंधित होना चाहिए और प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।।

सरकार के साथ-साथ आम जनता और मतदाताओं में भी नैतिकता का होना आवश्यक

इंजीनियरिंग कॉलेज रीवा के प्रोसेसर एवं संवैधानिक विशेषज्ञ डॉक्टर उत्तम द्विवेदी ने बताया हमें संस्कारों के प्रति भी जागरूक रहना पड़ेगा और हमें यह देखना पड़ेगा कि जो लोग हमारे घरों से तैयार हो रहे हैं वह संस्कारी तो हैं। आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम स्वयं ही जनप्रतिनिधियों को चुन रहे हैं और चुनने के बाद हम जनप्रतिनिधियों को दोषी ठहराते हैं। हमें ऐसे जनप्रतिनिधियों का चुनाव नहीं करना चाहिए जिनका आपराधिक रिकॉर्ड हो और जो धन देकर वोट प्राप्त करते हैं। उन्होंने कहा हमारे देश में विकल्प मौजूदगी भी एक समस्या है जिसमें कुछ गिने-चुने पार्टियां और उनके प्रतिनिधि चुनाव मैदान में होते हैं इसलिए हमें मजबूरन उन्हीं में से चुनाव करना होता है। उन्होंने अडानी मुद्दे पर अपना विचार रखते हुए कहा कि बड़ा ताज्जुब होता है जब संसद में सदस्य अडानी की संपत्ति की जांच की मांग करते हैं लेकिन वही स्वयं उनकी जो कई गुना ज्यादा संपत्ति बढ़ रही है उसके विषय में बात करना पसंद नहीं करते। उन्होंने कहा कि संसद में नियम कायदे इन्हीं सांसदों के द्वारा पास किए जाते हैं और जिनमें यह स्वयं दोषी हैं उसके बारे में कभी चर्चा नहीं करते। डॉ उत्तम द्विवेदी ने कई बिंदुओं पर प्रकाश डाला और चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा की धन खर्च कर चुनाव लड़ना बंद किया जाना चाहिए तभी हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि जो चुनकर आ रहे हैं वह धन वसूली नहीं करेंगे।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पधारे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं नेशनल फेडरेशन फॉर सोसायटी फॉर फास्ट जस्टिस के जनरल सेक्रेटरी प्रवीण पटेल ने भी अपने विचार रखे और कहा कि चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए एवं जनप्रतिनिधियों की संपत्तियों में अकूत बढ़ोत्तरी पर लगाम लगानी चाहिए। वही कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने भी अपने विचार रखे और उन्होंने भी राजनेताओं के साथ-साथ वोटर और आम जनता पर भी सवाल खड़ा किया और कहा कि हमारे घर से ही नैतिकता प्रारंभ होती है और हमें स्वयं भी यह ध्यान देने की जरूरत है कि नैतिक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करें जिससे ऐसे व्यक्तियों का चुनाव ही न हो पाए जो गलत छवि अपराधिक प्रवृत्ति और पैसे की लेनदेन कर चुनाव जीत रहे हैं।  उन्होंने कहा कि कहीं न कहीं इसके पीछे हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं।

कार्यक्रम में अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने भी अपनी बातें रखी जिसमें आरटीआई रिसोर्स पर्सन विरेंद्र कुमार ठक्कर, रजी हसन, ललित सोनी, जयपाल सिंह खींची, धनीराम गुप्ता आदि सम्मिलित रहे।
कार्यक्रम का संयोजन शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह देवेंद्र अग्रवाल, सुनील खंडेलवाल, राजेश मिश्रा आदि सम्मिलित रहे।

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National Breaking: प्रस्तावित डेटा बिल के आरटीआई कानून के दुष्प्रभावी संशोधन पर झारखंड हजारीबाग में कार्यकर्ताओं ने कसी कमर

यदि डेटा बिल अपने वर्तमान स्वरूप में पारित होगा तो राशन पेंशन की जानकारी मिलना होगा मुश्किल – निखिल डे //

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आरटीआई कानून को मजबूत करने और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए झारखंड की जनता को आगे आना होगा – राहुल सिंह //

झारखंड से ही आरटीआई कानून की रक्षा का लें संकल्प, प्रारंभ करें एक नया आंदोलन – अरुणा राय//

दिनांक 29 जनवरी 2023 रीवा मध्य प्रदेश।

सूचना के अधिकार मामलों को लेकर आयोजित किए गए 136 वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार में झारखंड हजारीबाग में आयोजित दो दिवसीय सूचना के अधिकार की रक्षा, संवर्धन और प्रचार-प्रसार विषय पर सेमिनार को ऑनलाइन वेबीनार से जोड़ते हुए 3 घंटे का कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस बीच देश के जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ताओं, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों और वर्तमान एवं पूर्व राज्य सूचना आयुक्त सहित केंद्रीय सूचना आयुक्त ने कार्यक्रम में अपनी सहभागिता दी।

प्रस्तावित डेटा बिल का वर्तमान मसौदा आरटीआई कानून के लिए घातक, सामान्य जानकारी मिलना होगा मुश्किल – निखिल डे

मजदूर किसान शक्ति संगठन और एनसीपीआरआई के सह-संस्थापक निखिल डे ने बताया कि यदि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल का प्रस्तावित मसौदा लागू होगा तो इससे आरटीआई कानून में गलत ढंग से संशोधन किया जाकर सामान्य जानकारी मिलना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने सहभागियों के प्रश्नों के जवाब देते हुए सभी को अवगत कराया कि किस प्रकार राजस्थान में जन सूचना पोर्टल के माध्यम से छोटी-छोटी जानकारियां हासिल कर भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है। उन्होंने स्लाइड प्रेजेंटेशन के माध्यम से दिखाया कि कैसे राजस्थान सरकार द्वारा जन सूचना पोर्टल में सभी विभागों की सामान्य से लेकर सभी जानकारियां साझा की जा रही है और चाहे वह माइनिंग से संबंधित हो, खनिज संपदा के दोहन से संबंधित हो अथवा राशन या पेंशन की जानकारी हो सभी कुछ आसानी से प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि यदि डेटा बिल का प्रस्तावित मसौदा लागू हो जाएगा तो धारा 4 के तहत यह सब जानकारी व्यक्तिगत जानकारी बताते हुए पोर्टल से हटा दी जाएंगी जिससे पारदर्शिता पर बड़ा आघात लगेगा।
निखिल डे ने सभी देश के नागरिकों और आरटीआई कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर डेटा बिल के प्रस्तावित प्रावधान से आरटीआई कानून को प्रभावित करने वाले मसौदे को हटाए जाने की बात की है।

झारखंड की धरती से ही करें एक नए आंदोलन की आगाज, आरटीआई कानून की रक्षा हमारा पहला उद्देश्य – अरुणा राय

प्रसिद्ध समाजसेविका एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन की सह संस्थापक अरुणा राय ने कहा कि आरटीआई कानून को अस्तित्व में लाने के लिए राजस्थान की धरती से आंदोलन चालू हुआ और किस प्रकार मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े हुए मजदूरों और किसानों ने इस आंदोलन को नई ऊर्जा दी थी। परंतु आज जब आरटीआई कानून पर एक बार पुनः खतरा मंडरा रहा है और लोकतंत्र में पारदर्शिता के विरोधी तत्वों द्वारा आरटीआई कानून पर आघात लगाए जाने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में झारखंड हजारीबाग की धरती पर आयोजित इस सेमिनार से ही आरटीआई कानून को बचाने का संकल्प लेते हुए एक नया आंदोलन प्रारंभ किया जाए। उन्होंने निखिल डे, राहुल सिंह एवं उपस्थित प्रतिभागियों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अब इसी प्रकार का एक बड़ा आंदोलन दिल्ली में किया जाना चाहिए और जन समर्थन जुटाया जाना चाहिए तभी आरटीआई कानून को बचाया जा सकेगा।

झारखंड में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति और सूचना आयोग के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जनता को आगे आने की आवश्यकता – राहुल सिंह

झारखंड में हजारीबाग में आयोजित दो दिवसीय सेमिनार के समापन दिवस 29 जनवरी 2023 को उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए मध्य प्रदेश के वर्तमान राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की झारखंड राज्य में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति न होना एक चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि एक लंबे अरसे से वेबीनार के माध्यम से भी झारखंड क्षेत्र के जुड़ने वाले साथियों के माध्यम से यह जानकारी प्राप्त होती रही है कि कैसे झारखंड के आम नागरिक सूचना प्राप्त करने के लिए परेशान हो रहे हैं क्योंकि वहां विधानसभा में विपक्षी दल का नेता न होने से मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। जिसकी वजह से सूचना आयोग क्रियाशील नहीं है। इस विषय पर राहुल सिंह ने कहा कि झारखंड की जनता को इसके लिए आगे आना पड़ेगा और मिलकर आवाज उठानी पड़ेगी। उन्होंने उपस्थित सहभागियों के प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा की प्रस्तावित डेटा बिल के माध्यम से आरटीआई कानून के संशोधन से आरटीआई कानून लगभग समाप्त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि कोर्ट के द्वारा दिए जा रहे निर्णय के विषय में भी चर्चा करनी चाहिए लेकिन हम सकारात्मक निर्णय पर भी केंद्रित करें।

कार्यक्रम में वेबीनार के माध्यम से पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने भी अपने विचार रखे और स्लाइड शो प्रेजेंटेशन के माध्यम से प्रस्तावित डेटा बिल से आरटीआई कानून को होने वाली हानि के विषय में अपनी प्रस्तुति दी और बताया कि कैसे डेटा बिल की धारा 29(2) और 30(2) दोनों ही हटाई जानी आवश्यक है अन्यथा आरटीआई कानून पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएगा।

कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप एवं माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक एवं वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता भास्कर प्रभु ने भी अपने विचार रखे।

झारखंड हजारीबाग से राष्ट्रीय सेमिनार का संयोजन वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता सुनील खंडेलवाल, राजेश मिश्रा एवं छत्तीसगढ़ से देवेंद्र अग्रवाल आदि के द्वारा किया गया जबकि वेबीनार का संयोजन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, वरिष्ठ पत्रिका समूह के पत्रकार मृगेंद्र सिंह एवं आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप के आईटी सेल के प्रमुख पवन दुबे के द्वारा किया गया।

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National Breaking: डेटा बिल में व्यक्तिगत और गैर व्यक्तिगत जानकारी की परिभाषा को सरकार को स्पष्ट करना चाहिए – पूर्व मुख्य केंद्रीय सूचना आयुक्त बिमल जुल्का

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बोवडे वाली जजों की बेंच के आदेश के बाद आर टी आई कानून कमजोर हुआ कहा आयुक्त बिमल जुल्का ने // अब बचे खुचे आर टी आई कानून को डेटा बिल से भी होगा नुकसान // धारा 8(1)(जे) के संशोधन से जानकारी प्राप्त करने में आमजन को होगी मुश्किल // उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने भी स्लाइड प्रेजेंटेशन से डेटा बिल बिल के प्रावधानों की विस्तार से की चर्चा।

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दिनांक 15 जनवरी 2023 रीवा मध्य प्रदेश।

भारत सरकार के प्रस्तावित डेटा प्रोटेक्शन बिल 2022-23 के वर्तमान मसौदे का सूचना के अधिकार कानून पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ेगा इस बात को लेकर एक बार पुनः 134 वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार का आयोजन किया गया।

प्रस्तावित डेटा प्रोटेक्शन बिल में व्यक्तिगत जानकारी के नाम पर सूचनाएं मिलना होगा मुश्किल – बिमल जुल्का

आरटीआई कानून पर होने वाले दुष्प्रभाव पर चर्चा करते हुए पूर्व केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त विमल जुल्का ने कहा कि आरटीआई कानून जब बनाया गया उसमें सभी प्रावधान अच्छी प्रकार स्पष्ट किए गए थे। लेकिन समय के साथ इस पर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न आदेशों के माध्यम से संशोधन भी किए गए। जिसकी वजह से कानून में काफी कमजोरी आई है और काफी जानकारियां जस्टिस बोबडे और अन्य जजों की पीठ के द्वारा दिए गए निर्णय के बाद वर्ष 2018-19 के दरम्यान निजी जानकारियों की श्रेणी में आने से उन्हे देने के लिए आदेश में मनाही की गई। अब यदि देखा जाए तो वर्तमान प्रस्तावित डेटा प्रोटेक्शन बिल के माध्यम से आरटीआई कानून की धारा 8(1)(जे) को संशोधित किए जाने का प्रयास चल रहा है इससे काफी लोकहित से जुड़ी हुई जानकारियां प्राप्त होने में आमजन को कठिनाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि आरटीआई कानून का उपयोग दुर्भावना से नहीं किया जाना चाहिए। कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि दुर्भावना पूर्वक मांगी गई जानकारियों की वजह से जब मामले कोर्ट स्तर तक जाते हैं तो वहां न्यायालय के आदेश के बाद उनमें संशोधन हो जाता है जिसकी वजह से सूचना आयोग भी फिर जानकारियां दिलवा पाने में असमर्थ रहता है। उन्होंने कहा कि सूचना आयुक्त के तौर पर हमारे लिए चिंता का विषय है कि देश में पारदर्शिता के लिए जाना माना आर टी आई कानून कमजोर न किया जाए। इसके लिए हम सबको प्रयास करने की आवश्यकता है।
पहली बार राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार में शिरकत किए पूर्व मुख्य केंद्रीय सूचना आयुक्त बिमल जुल्का ने कहा कि सतत आरटीआई कानून के विषय में इस प्रकार ऑनलाइन और ऑफलाइन चर्चा किए जाने से लोगों में जन जागरूकता बढ़ेगी जो एक अच्छे लोकतांत्रिक समाज का उद्देश्य होना चाहिए।

जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण एवं संसदीय समिति के डेटा बिल के पिछले 2018-19 के मसौदे वर्तमान प्रस्तावित मसौदे 2022 से बेहतर – वीरेंद्र कुमार ठक्कर

कार्यक्रम में हमेशा अपने विचार रखने वाले उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने विस्तारपूर्वक स्लाइड प्रेजेंटेशन के माध्यम से डेटा प्रोटेक्शन बिल के कई मसलों पर चर्चा की। उन्होंने वर्ष 2018-19 में जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा कमेटी एवं 2019-20 में संसदीय कमेटी के पूर्व प्रस्तावित बिल के मसौदे पर भी प्रकाश डाला और उसकी तुलना वर्तमान 2022 के डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटक्शन बिल के मसौदे से किया। वीरेंद्र ठक्कर ने विस्तार से बिल के सभी पहलुओं पर चर्चा की और बताया की आरटीआई कानून को कमजोर करने वाली जो कड़ी प्रस्तावित डेटा बिल 2022-23 के वर्तमान प्रस्तावित मसौदे में धारा 29(2) और 30(2) के रूप में डाली गई है उसके बाद आरटीआई कानून का सर्वोपरि प्रभाव खत्म हो जाएगा और साथ में 8(1)(जे) के प्रावधान भी हटा दिए जाएंगे इसमें किसी षडयंत्र की बू आ रही है। उन्होंने कहा कि हालांकि अभी संसद मे बिल पास नहीं हुआ है इसलिए उम्मीद की जा रही है कि दोनों ही प्रावधान बिल से हटाए जाएंगे।

कार्यक्रम में पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने भी शिरकत की और थोड़े समय के लिए आरटीआई कानून पर अपने विचार रखें। छत्तीसगढ़ से आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र कुमार अग्रवाल ने भी स्लाइड प्रेजेंटेशन के माध्यम से डेटा प्रोटेक्शन बिल और आरटीआई कानून के बारे में चर्चा की। कार्यक्रम में विचार विमर्श के दौरान कई आरटीआई कार्यकर्ता सोमशेखर राव, ग्वालियर से राज तिवारी एवं राजगढ़ मध्य प्रदेश से जयपाल सिंह खींची सहित कई आरटीआई कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम का संचालन पूर्व की भांति सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, देवेंद्र अग्रवाल, आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप के आईटी सेल के प्रमुख पवन दुबे एवं पत्रिका समूह के वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह के द्वारा किया गया।

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National Breaking: जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा कमेटी और जेपीसी की अनुसंसा रिपोर्ट को दरकिनार कर लाया गया डेटा बिल – वीरेंद्र कुमार ठक्कर

प्रस्तावित डेटा प्रोटेक्शन बिल के दुष्प्रभावी बिंदुओं पर विशेषज्ञों ने रखी राय // कहा जस्टिस श्रीकृष्णा कमेटी और जेपीसी कमेटी की अनुशंसा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता // देशभर के आरटीआई कार्यकर्ताओं ने डेटा बिल से प्रस्तावित आरटीआई मसौदे को हटाए जाने की मांग की।।

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दिनांक 8 जनवरी 2023 रीवा मध्य प्रदेश

भारत सरकार के प्रस्तावित डेटा प्रोटेक्शन बिल 2022-23 के मसौदे को लेकर देशव्यापी आक्रोश जारी है। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किए गए 133 वें राष्ट्रीय सूचना के अधिकार वेबीनार में उपस्थित विशेषज्ञों ने एक बार पुनः अपनी चिंता जाहिर करते हुए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल को आरटीआई कानून के लिए बड़ा खतरा बताया है।

जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा और जेपीसी कमेटी की अनुशंसा को किया गया दरकिनार – वीरेंद्र कुमार ठक्कर

कार्यक्रम में अपना विचार रखते हुए आईटी प्रोफेसर एवं उत्तराखंड आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने बताया की प्रस्तावित डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल 2022-23 के मसौदे में आरटीआई कानून को संशोधन करने वाली धारा 29(2) और 30(2) को लेकर आश्चर्य की स्थिति निर्मित हो रही है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा ने भी अपने रिपोर्ट में आरटीआई कानून के साथ किसी भी तरह छेड़छाड़ किए जाने का कोई उल्लेख नहीं किया था और न ही बाद में 81 बिंदुओं के दिए गए संशोधन में जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी जेपीसी द्वारा ही आरटीआई कानून के किसी भी प्रावधान को हटाए जाने का उल्लेख नहीं था तो सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक वर्ष 2022 में लांच किए गए प्रस्तावित डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल में आखिर इसकी धारा 29(2) और 30(2) में आरटीआई कानून के ऊपर प्रभाव डालने वाले संशोधनों की बात कैसे आ गई और उन्होंने सवाल खड़े किए इसमें कहीं न कहीं उच्च पदों पर बैठे हुए ब्यूरोक्रेटिक अधिकारियों की दुर्भावना प्रतीत होती है जिसकी वजह से आरटीआई कानून को कमजोर किया जाकर शासकीय कामकाज की पारदर्शिता को समाप्त किया जाए जिससे अंडरटेबल भ्रष्टाचार समाज के सामने उजागर न हो पाए। वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने यह भी कहा कि यदि संपूर्ण डाटा बिल को पढ़ा जाए तो उसमें कई खूबियां भी हैं जो वर्तमान समय के लिए बेहद आवश्यक है लेकिन जहां तक सवाल आरटीआई कानून के दुष्प्रभावी संशोधन को लेकर है वह निश्चित रूप से चिंताजनक है और ऐसे समस्त प्रावधान हटाया जाना चाहिए जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर बुरा प्रभाव पड़े।

अब सभी आंदोलन जनता के हवाले, जनता ही अपना भाग्य तय करें, हम भी आवाज उठाते रहेंगे- आत्मदीप

पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने बताया की वर्तमान स्थिति जिस प्रकार से निर्मित हुई है और प्रस्तावित डेटा बिल के माध्यम से सरकार ने जो मसौदा तैयार किया है उसमें आरटीआई कानून को दुष्प्रभावी ढंग से संशोधित किए जाने का प्रयास चल रहा है उन्होंने इसे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा इसके लिए जनता को अधिक से अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है और आरटीआई कानून को बचाने के लिए सड़क पर उतरने की भी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि चर्चा का दौर जारी रहे और निरंतर चलता रहे और इसे एक आंदोलन का रूप लेना पड़ेगा और जब जगह-जगह चर्चाएं होंगी और राजनीतिक दलों को यह पता चलेगा कि यदि आरटीआई कानून के साथ छेड़छाड़ की गई तो यह उनकी पार्टी के लिए भी खतरा होगा तभी कुछ हो सकता है वरना तानाशाही के इस दौर में कोई भी अच्छा कानून बचाए रखना हमारे लिए एक चुनौती पूर्ण रहेगा। आत्मदीप ने बताया कि लोगों को विभिन्न राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठनों से लेकर विधायक सांसद और मंत्रियों के बीच में जाकर अपनी बात रखनी चाहिए और आरटीआई कानून के महत्व को रेखांकित करते हुए इस कानून को बचाए रखने के लिए प्रयास करने चाहिए। यदि नागरिक अपने जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाएंगे तो निश्चित तौर पर उन्हें झुकना पड़ेगा और आरटीआई कानून के दुष्प्रभावी संशोधन को वापस लेना पड़ेगा।

देश के कई आरटीआई कार्यकर्ताओं ने रखे अपने विचार, कहा मिलकर करेंगे आंदोलन

आयोजित किए गए 133 वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार में भारत के विभिन्न राज्यों से आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित हुए और खुलकर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में आरटीआई कानून को बचाने के लिए अपने विचार रखते हुए बंगाल से आशीष नारायण विश्वास ने बताया कि वह निरंतर प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से लेकर हर स्तर पर लेख कर रहे हैं और लोगों को जागरूक कर रहे हैं। वही कर्नाटक से सोमशेखर राव ने भी कहा कि उन्होंने भी अपने स्तर से काफी प्रयास किए हैं और लोगों को जागरूक किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ से सामाजिक कार्यकर्ता देवेंद्र अग्रवाल ने कहा कि आरटीआई कानून को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है और यह आंदोलन आगे बढ़ना चाहिए। वही राजगढ़ से जयपाल सिंह खींची ने कहा कि वह पहले ही ज्ञापन संबंधित जिला कलेक्टर संभागायुक्त सभी को दे चुके हैं और आगे भी अपना अभियान जारी रखेंगे। उत्तर प्रदेश से एम गांधी ने कहा कि उन्होंने स्थानीय समाचार पत्रों से लेकर व्हाट्सएप ग्रुप और तमाम यह बात फैलाई है और निरंतर प्रयास कर रहे हैं लेकिन जनता अभी उतनी जागरूक नहीं हुई है हमें प्रयास जारी रखना पड़ेगा। झारखंड से मोहम्मद अंसारी एवं मेघराज सिंह ने बताया कि उन्होंने भी इस विषय पर संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों सहित प्रधानमंत्री और संबंधित कार्यालयों को पत्राचार और ईमेल करके डाटा बिल से दुष्प्रभावी आरटीआई कानून के संशोधन को वापस लिए जाने की मांग की है। गुड़गांव से महेंद्र कुमार ने भी कहा की वह भी सतत प्रयास कर रहे हैं और बात आगे तक पहुंचा रहे हैं वही आरटीआई खुलासा नाम से संचालित ग्रुप से रजी हसन ने बताया कि उनके द्वारा भी प्रयास जारी है और इसके एवज में उन्हें धमकियों का भी सामना करना पड़ रहा है लेकिन उनका आंदोलन चलता रहेगा। नागपुर से आरटीआई कार्यकर्ता विनय कांबले ने कहा कि महाराष्ट्र में तो सूचना आयोग ही पूरी तरह से आरटीआई के विपरीत काम कर रहा है और आरटीआई लगाने वालों के ऊपर उल्टा एफआईआर दर्ज करवा रहा है जो दुर्भाग्यपूर्ण है और इसके विरुद्ध उनका आंदोलन जारी रहेगा। इसी प्रकार देश के हर कोने से आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरटीआई कानून को बचाने के लिए मुहिम तेज कर दी है और जगह-जगह ज्ञापन धरने प्रदर्शन और आंदोलन करते हुए आमजन को जागरूक करते हुए सरकार को संदेश भेज रहे हैं।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में पत्रिका समूह के वरिष्ठ संपादक मृगेंद्र सिंह, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा एवं आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप के आईटी सेल के प्रमुख पवन दुबे सम्मिलित रहे।

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National Breaking: प्रशासनिक अधिकारियों और शासकीय अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट को गुमराह करते हुए तथ्यविहीन जांच और फर्जी पुलिस खात्मा रिपोर्ट पर कलेक्टर और कमिश्नर की जांच सहित FIR शून्य बताया

फर्जी तरीके से बिना खात्मा FIR शून्य बताकर सभी आरोपियों को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में मिली क्लीन चिट।।

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दिनांक 29 दिसंबर 2022 रीवा मध्य प्रदेश

भारतीय न्यायिक इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है जब एक व्यापक स्तर के कराधान घोटाले को लेकर हाईकोर्ट जबलपुर को गुमराह किए जाने का मामला सामने आया है। प्राप्त तथ्यों और सबूतों के आधार पर जो बात सामने निकल कर आई है उससे अब न्यायपालिका के ऊपर से लोगों का पूरी तरह से विश्वास उठने लगेगा। गंगेव जनपद की 38 ग्राम पंचायतों में हुए व्यापक स्तर के कराधान घोटाले में तत्कालीन कलेक्टर एवं कमिश्नर के जांच प्रतिवेदन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार उजागर हुआ था। व्यापक स्तर के भ्रष्टाचार की जांच की गई और जांच प्रतिवेदन में जहां तत्कालीन कलेक्टर रीवा ओम प्रकाश श्रीवास्तव एवं तत्कालीन कमिश्नर रीवा संभाग अशोक भार्गव के द्वारा गठित संभाग स्तरीय जांच दल ने लगभग 12 करोड़ रुपए की राशि प्राइवेट वेंडरों के खातों में बिना कार्ययोजना और बिना कार्य कराए ही जारी कर दिए जाने का प्रतिवेदन दिया था उसके बाद लीपापोती का खेल प्रारंभ हुआ। मामले पर बिना किसी अधिकारिता के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा द्वारा उक्त दोनों जांचों को कचरे के डिब्बे में डालते हुए जो जांच संभागस्तरीय अधिकारियों और अधीक्षण यंत्री स्तर के अधिकारी द्वारा की गई थी उसे वापस निचले स्तर के उपयंत्रियो और प्रभारी सहायक यंत्रियों के स्तर की अलग से करवा दी गई जिसके आधार पर बाद में चलकर दोषी 27 ग्राम पंचायतों के 22 सरपंच सचिव इंजीनियर एवं कराधान घोटाले के मास्टरमाइंड निलंबित राजेश सोनी जनपद पंचायत गंगेव सहायक ग्रेड 3 को हाईकोर्ट जबलपुर से क्लीन चिट प्राप्त हो गई है।
जबकि पुलिस अधीक्षक कार्यालय रीवा एवं एसडीओपी कार्यालय मनगवा में लगाई गई आरटीआई में जानकारी प्राप्त हुई है जिसमें बताया गया है कि मनगवां थाने में आरोपियो निलंबित लिपिक सहायक ग्रेड 3 राजेश सोनी, शिवशक्ति कंस्ट्रक्शन के प्रोपराइटर नागेंद्र सिंह और रोजगार सहायक रही उनकी पुत्री प्रतिभा सिंह के विरुद्ध दर्ज अपराध क्रमांक 470/2020 आईपीसी की धाराएं 409, 420, 120बी एवं आईटी एक्ट की धाराएं 66सी एवं 66डी में कोई खात्मा रिपोर्ट नहीं लगाई गई है। प्राप्त जानकारी में यहां तक बताया गया है कि पिछले 2 वर्ष से दो आरोपियों राजेश सोनी और नागेंद्र सिंह के विरुद्ध तो मनगवां पुलिस ने अब तक चार्जशीट भी पेश नहीं की है।
अब बड़ा सवाल यह है कि जब एफआईआर में खात्मा रिपोर्ट नहीं लगाई गई तो फिर कैसे प्रशासनिक अधिकारियों और शासकीय अधिवक्ताओं ने ऐसी भ्रामक और गुमराह करने वाली जानकारी हाईकोर्ट में देकर संबंधित आरोपियों को क्लीन चिट दिलवाए जाने में मदद की?

संलग्न – कृपया संलग्न संबंधित हाईकोर्ट जबलपुर का वह आदेश प्राप्त करें जिसमें त्रुटि पूर्ण तरीके से क्लीनचिट में खात्मा रिपोर्ट होना बताया गया है और साथ में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा पुलिस अधीक्षक कार्यालय रीवा में लगाई गई उस आरटीआई को भी प्राप्त करें जिसमें पुलिस ने उसी हाईकोर्ट के आदेश में खात्मा होने से इनकार किया है।

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National Breaking: हिनौती पंचायत में बनेगा एशिया का दूसरा सबसे बड़ा गो-अभ्यारण

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मगवाया प्रस्ताव // सीईओ और रीवा कलेक्टर ने भेजी जानकारी // 500 हेक्टेयर से अधिक भूभाग में बनेगा गो-अभ्यारण // जैविक खेती और पशु आधारित रोजगार की बढ़ेगी अपार संभावनाएं // गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने दशकों पहले उठाई थी माग // विंध्य किसान परिषद के संयोजक रोहित तिवारी के पत्र पर वर्तमान त्यौंथर विधायक श्यामलाल द्विवेदी ने भी मामले पर लिया संज्ञान //

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दिनांक 18 नवंबर 2022 रीवा मध्य प्रदेश।

मध्यप्रदेश में गोवंशों की सुरक्षा पोषण और पुनर्वास के लिए रीवा जिले के गंगेव ब्लाक अंतर्गत हिनौती ग्राम पंचायत के गदही ग्राम में लगभग 500 हेक्टेयर से अधिक शासकीय और 2000 एकड़ से अधिक जंगली भूभाग में गो-अभ्यारण बनाए जाने के लिए प्रस्ताव मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन शिवराज सिंह चौहान की तरफ से मांगा गया है।

हिनौती में बनेगा एशिया का दूसरा सबसे बड़ा गांव अभ्यारण

मध्य प्रदेश के आगर मालवा क्षेत्र में 750 हेक्टेयर से अधिक जमीन पर बने एशिया के सबसे बड़े गो-अभ्यारण के बाद रीवा जिले के हिनौती ग्राम पंचायत के गदही ग्राम में 500 हेक्टेयर से अधिक जमीन पर दूसरा सबसे बड़ा गौ-अभ्यारण बनाया जाएगा। मामले की जानकारी मुख्यमंत्री कार्यालय से मांगी गई है जिसमें दिनांक 17 नवंबर 2022 को रीवा कलेक्टर द्वारा प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश गोपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड भोपाल को लेख करते हुए जानकारी भेजी गई है।

गदही में 500 हेक्टेयर से अधिक जमीन पर गो-अभ्यारण के लिए दशकों पूर्व उठाई गई माग

बता दें कि मामले पर सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी के द्वारा पूर्व में मांग उठाई गई थी। जब 2012-13 के आसपास क्षेत्र में अवैध बाड़े बनाए जाकर गोवंशों के साथ प्रताड़ना की जा रही थी और उन्हें भूखे प्यासे ठंड ठिठुरन बरसात में मरने के लिए छोड़ा जा रहा था उस समय युद्ध स्तर पर लड़ाई लेते हुए शिवानंद द्विवेदी ने जहां अवैध बाडों को तोड़ने और गोवंशों को आजाद करवाने का कार्य किया वहीं हिनौती के गदही क्षेत्र में 500 हेक्टेयर से अधिक पड़े काश्तकारी योग्य भूभाग पर विशाल गौ-अभ्यारण बनाए जाने हेतु प्रस्ताव तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी को दिनांक 18 जनवरी 2017 एवं दिनांक 8 फरवरी 2017 को चीफ मिनिस्टर मध्य प्रदेश, तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी, चीफ सेक्रेट्री मध्य प्रदेश शासन, डायरेक्टर वेटरनरी विभाग मध्यप्रदेश शासन, पुलिस महानिदेशक मध्यप्रदेश शासन, भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड सहित समस्त प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार भेजा जा चुका था।

मामले पर मीडिया का रोल अहम – मीडिया के माध्यम से हमेशा उठाया जाता रहा मामला

जहां मामले को संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री आदि को भेजा गया वहीं समय-समय पर प्रादेशिक और राष्ट्रीय मीडिया में गोवंशों के साथ हो रही निरंतर क्रूरता को बड़े पैमाने पर उठाया जाता रहा है। जब भी अवैध बाडों में मवेशियों को कैद किया गया, बेसहारा गोवंशों के मुंह पैर बांध दिए गए एवं घाटियों जलप्रपातों एवं पहाड़ियों से हजारों फीट गहरे झुंड में धकेल दिए गए तब तब रीवा जिले में गोवंशों की सुरक्षा पोषण और पुनर्वास हेतु विशाल गो-अभ्यारण बनाए जाने का मामला भी उठाया गया है। लेकिन सवाल ये था कि गोवंशों के नाम पर मात्र राजनीति चलती रही लेकिन एक बार पुनः मामले पर संज्ञान लिया गया और मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन की तरफ से प्रस्ताव मंगवाया गया है जो एक बार पुनः क्षेत्र के बेसहारा गोवंशों और पीड़ित किसानों के लिए राहत की बात कही जा सकती है।

मामले को लेकर 2017 में जबलपुर हाईकोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका

गोवंशों की सुरक्षा पोषण और पुनर्वास और संवर्धन को लेकर क्षेत्र की रिक्त भूमियों में विशाल गो-अभ्यारण बनाए जाने हेतु गोवंश राईट एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी द्वारा अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा के माध्यम से जबलपुर उच्च न्यायालय में रिट पिटिशन डब्लूपी क्रमांक 28788/2018 भी दायर की गई थी जिसमें चीफ सेक्रेटरी मध्यप्रदेश शासन, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया, पशुसंवर्धन बोर्ड, वेटरनरी डिपार्टमेंट मप्र शासन, डीजीपी मध्यप्रदेश शासन, कलेक्टर एवं एसपी रीवा सहित सब को पार्टी बनाया जाकर नोटिस जारी की गई थी।
हालांकि मामले पर अंतिम सुनवाई अभी तक नहीं हुई है लेकिन शासन के द्वारा जवाब प्रस्तुत किया जा चुका है।

विधायक त्यौंथर श्यामलाल द्विवेदी के पत्र से एक बार पुनः मामले में हलचल

गंगेव जनपद क्षेत्र के हिनौती ग्राम पंचायत के गदही ग्राम में 500 हेक्टेयर से अधिक रिक्त पड़े काश्तकारी योग्य शासकीय भूभाग में गो-अभ्यारण बनाए जाने का प्रस्ताव एक बार पुनः पत्र क्रमांक 70/238/022 दिनांक 08/11/2022 के माध्यम से त्यौंथर विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्यामलाल द्विवेदी के माध्यम से मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन को भेजा गया है। जिसके बाद गंगेव जनपद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पत्र क्रमांक 1235/स्था0/पं/ज0पं0/2022 दिनांक 11/11/2022 के माध्यम से गंगेव के सहायक यंत्री श्रीकांत द्विवेदी के माध्यम से जांच कराई जाकर सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी एवं उपयंत्री प्रवीण पांडेय मनीष तिवारी एवं ग्राम पंचायत हिनौती के सचिव आदि की उपस्थिति में सर्वे किया जाकर एक बार पुनः प्रस्ताव शासन की तरफ भेज दिया गया है।

15 से 20 गौशाला शेड बनाए जाने और विशाल गो-अभ्यारण का भेजा गया प्रस्ताव

मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा एवं कलेक्टर जिला रीवा के माध्यम से तैयार की गई रिपोर्ट क्रमांक 8057/जि0पं0/2022 रीवा दिनांक 17/11/2022 के माध्यम से प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश गोपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड भोपाल को भेजे गए अपने प्रस्ताव में उक्त पत्रों का उल्लेख करते हुए कलेक्टर रीवा के द्वारा लेख किया गया है की हिनौती के गदही ग्राम में एक गौशाला पहले से ही निर्मित और संचालित है एवं शेष दो गौशालाओं में कार्य प्रारंभ है जो निर्माणाधीन अवस्था में है। इस बीच 500 हेक्टेयर से अधिक राजस्व का शासकीय भूभाग है एवं साथ में 2000 एकड़ से अधिक जंगल से लगा हुआ जंगली भूभाग है और इसमें विशाल गो-अभ्यारण बनाए जाने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। आगे लेख किया गया है एक ही स्थान पर 15 से लेकर 20 गौशाला शेड आसानी से बनाए जा सकते हैं एवं तीन अमृत सरोवर पहले से ही निर्माणाधीन है जिससे वहां पर गोवांशों को पानी के लिए भी दिक्कत नहीं होगी। गौशाला अभ्यारण स्वीकृत होने से क्षेत्र में खेती को नुकसान से बचाया जा सकेगा तथा गोवांशो की उचित देखरेख संभव हो सकेगी। गो-अभ्यारण निर्मित होने से क्षेत्रीय स्वसहायता समूहों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे। अतः उक्त तथ्यों का उल्लेख करते हुए रीवा जिले के गंगेव जनपद के हिनौती ग्राम पंचायत के गदही क्षेत्र में 500 हेक्टेयर से अधिक राजस्व के शासकीय भूभाग एवं 2000 एकड़ से अधिक जंगल से सटे हुए जंगली भूभाग में विशाल गोअभ्यारण बनाए जाने का प्रस्ताव प्रेषित किया गया है। मामले पर तहसील सिरमौर के राजस्व निरीक्षक लालगांव की भी रिपोर्ट संलग्न की गई है।

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National Breaking: गांधी जयंती पर ग्राम स्वराज पर आयोजित हुआ 119वां राष्ट्रीय वेबिनार,ग्राम स्वराज की वास्तविक स्थापना हेतु ग्राम सभा की भूमिका अहम – चंद्रशेखर प्राण

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लोगों के बीच पहुंचकर ग्रामीण सुधार में वनवासी सेवा आश्रम की भूमिका महत्वपूर्ण रही – शुभा प्रेम

पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम स्वराज की स्थापना में आरटीआई की भूमिका महत्वपूर्ण – सूचना आयुक्त

दिनांक 2 अक्टूबर 2022 रीवा मध्य प्रदेश।

2 अक्टूबर गांधी जयंती दिवस पर ग्राम स्वराज्य ग्राम सभा पंचायती राज और पारदर्शिता विषय पर 119 वां राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार का आयोजन किया गया। वेबीनार में विशिष्ट अतिथि के तौर पर तीसरी सरकार अभियान के संयोजक चंद्रशेखर प्राण, बनवासी सेवा आश्रम की संचालिका सुश्री शुभा प्रेम, वर्तमान मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह, पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप सहित सैकड़ों आरटीआई से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं ने अपनी सहभागिता दी।

ग्राम स्वराज्य की स्थापना में ग्राम पंचायत के लोगों का रोल काफी अहम – चंद्रशेखर प्राण

वेबिनार में सबसे पहले अपना उद्बोधन देते हुए तीसरी सरकार अभियान के संयोजक चंद्रशेखर प्राण ने बताया कि महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज्य का सपना साकार करने के लिए अभी भी काफी मेहनत करने की आवश्यकता है। उन्होंने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर जाकर बताया कि कैसे संविधान में गांधीजी के इस मुद्दे को साइडलाइन कर दिया गया था और बाद में 90 के दशक के दौरान वापस पंचायती राज कानून व्यवस्था के माध्यम से इसे लागू करने का प्रयास किया गया। लेकिन स्वराज और स्वावलंबन की जो विचारधारा महात्मा गांधी ने रखी थी वह अभी भी कोसों दूर है। पंचायतों में दलाली प्रथा, पंचायती भ्रष्टाचार, फर्जी तरीके से आयोजित होने वाली ग्राम सभाएं और कार्यों में जमकर चल रही अनियमितता और भ्रष्टाचार पर भी उन्होंने प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इसके लिए लोगों के बीच जाकर जन-जन को जोड़कर अभियान चलाना पड़ेगा और उन्हें उनके वास्तविक अधिकार और कर्तव्यों के विषय में जागरूक करना पड़ेगा। उन्होंने काफी विस्तार से अपनी बात रखी जिसे उपस्थित श्रोताओं ने काफी सराहा।

बनवासी सेवा आश्रम का उद्देश्य गांव में जाकर लोगों को उनके अधिकार दिलाना और उनका शोषण रोकना – सुश्री शुभा प्रेम

उत्तर प्रदेश के बनवासी सेवा आश्रम की संचालिका सुश्री शुभा प्रेम ने बताया कि कैसे वह महात्मा गांधी के विचारधारा पर चलते हुए गांव-गांव में जाकर सत्य और अहिंसा को आधार बनाकर आमजन और वंचित लोगों के लिए लड़ाई लड़ी है। सूदखोरी और महाजनी प्रथा के दुरुपयोग और ग्रामीणों के किए जाने वाले शोषण अधिक ब्याज में पैसा उपलब्ध करवाना और जमीन गिरवी रख लेना और फिर उसे वापस न करना जैसे कई मामलों पर बनवासी सेवा आश्रम और उनके द्वारा काफी अच्छे प्रयास किए गए। उन्होंने बताया कि इस दौरान विरोधी लोगों ने पुलिस प्रशासन और प्रशासन के साथ मिलकर उनकी काफी प्रताड़ना भी की लेकिन वह महात्मा गांधी के विचारधारा से डिगे नहीं और अभी भी उसी दिशा में निरंतर कार्यरत हैं। शुभा प्रेम ने कहा की महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा को साकार करने के लिए जन-जन में जागृत लानी पड़ेगी और इसमें शासन प्रशासन का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि अभी इस दिशा में कुछ ग्राम पंचायतों को साथ में लेकर सरपंचों के माध्यम से ग्राम सभा और वार्ड सभा आयोजित कर बेहतर व्यवस्था बनाए जाने और पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने के प्रयास चल रहे हैं और लोगों को निरंतर जागरूक किया जा रहा है।

आरटीआई और पारदर्शिता से पंचायती राज व्यवस्था में मजबूती आई – सूचना आयुक्त

मध्य प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्त राहुल सिंह एवं पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप ने बताया कि सूचना का अधिकार कानून प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। जहां वर्ष 2005 के पहले मस्टररोल और ग्राम पंचायतों की जानकारी हासिल करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी और ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी नहीं मिल पाती थी वहीं अब इस कानून के आने के बाद लोग काफी संख्या में सूचना के अधिकार का आवेदन लगाते हैं और जब जानकारी नहीं मिलती है तो उसकी अपील सूचना आयोग तक कर रहे हैं। जब मामला सूचना आयुक्त के पास आता है तो उस पर न्यायोचित कार्यवाही करते हुए उन्हें जानकारी मुहैया कराई जाती है और जुर्माने भी लगाए जाते हैं। इस बीच राहुल सिंह ने बताया की पंचायतों में बेहतर व्यवस्था के लिए धारा 40 और 92 के कार्यवाही जिसमें जनप्रतिनिधियों और पंचायत कर्मचारियों के विरुद्ध वसूली और पद से पृथक करने की प्रक्रिया की जाती है एवं साथ में त्रिस्तरीय पंचायती चुनावों में शपथ पत्र और उनके चल अचल संपत्ति का ब्यौरा त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों के विषय में वेब पोर्टल पर सार्वजनिक करने के भी आदेश उन्हीं के कार्यकाल में दिए गए हैं जिससे पंचायतों में अब बेहतर व्यवस्था हो रही है।

कार्यक्रम में देश के विभिन्न कोनों से सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता जुड़े और सभी ने अपने प्रश्नों को रखा और उपस्थित विशेषज्ञों ने उनके जवाब दिए।
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में पत्रिका समूह के वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, देवेंद्र अग्रवाल, आईटी सेल से पवन दुबे आदि मौजूद रहे।

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National Breaking: वनाधिकार और आरटीआई विषय पर आयोजित हुआ 117 वां वेबिनार,पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने वेबीनार को किया संबोधित

कार्यक्रम में सूचना आयुक्त शैलेश गांधी और आत्मदीप भी रहे उपस्थित।

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सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण पटेल ने अपने जमीनी अनुभव किए साझा।

दिनांक 18 सितंबर 2022 रीवा मध्य प्रदेश।

वनाधिकार पारदर्शिता और आरटीआई को लेकर 117 वां राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार का आयोजन दिनांक 18 सितंबर 2022 को सुबह 11:00 से दोपहर 1:30 के बीच में किया गया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण पटेल ने अपने अनुभव और विचार साझा किए।

वनाधिकार से आदिवासियों को मिला उनका वास्तविक अधिकार – पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत

कार्यक्रम में सर्वप्रथम संबोधित करते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा के विभिन्न पदों पर अपनी सेवा देने वाले ओम प्रकाश रावत ने बताया कि जब वह मध्यप्रदेश में भारतीय प्रशासनिक सेवा के पद पर कार्य कर रहे थे उस समय मध्यप्रदेश की सरकार ने आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने बताया कि भारतीय वन अधिनियम अंग्रेजों के समय पर लाया गया कानून था जिसके बाद आदिवासियों का काफी शोषण भी हुआ। लेकिन उसके साथ साथ वन क्षेत्र का संरक्षण एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा भी भारतीय वन अधिनियम के अंतर्गत सुनिश्चित हुई थी। श्री रावत ने बताया अंग्रेजों के कानून के कारण जंगली भूभाग में अपना जीवन यापन करने वाले और वन संपदा के आधार पर अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले लोगों के अधिकारों का हनन भी होने लगा क्योंकि वह शिक्षित नहीं होते थे और शिक्षा और जागरूकता के अभाव में नियम कानून उन्हें समझ में नहीं आता था जिसकी वजह से उनके ऊपर कई बार झूठे मामले भी दर्ज कर दिए जाते थे जिसके बोझ तले उनका जीवन बर्बाद हो जाता था। इसके बाद इस दिशा में सुधार हुआ और अब जब स्वतंत्र भारत में मानवाधिकार संरक्षण की बात होने लगी उस दिशा में वनाधिकार कानून लाए गए और उनको लागू कराने और इंप्लीमेंटेशन के द्वारा आदिवासियों और जंगलों में निवास करने वाले लोगों को उनके अधिकार दिलाए गए। ओम प्रकाश रावत ने बताया कि वनाधिकार कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें उस गांव और कबीले के लोगों के अधिकार और कानून वही कबीले और गांव के दो तिहाई लोग ही सुनिश्चित करते थे जो ग्राम सभा में विधिवत प्रस्तावित होकर सबडिवीजन और डिस्ट्रिक्ट लेवल पर कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत किए जाते थे। इन सबसे कम्युनिकेशन का स्तर बेहतर हुआ और जो अशिक्षित और ग्रामीण आदिवासी अपनी बात खड़ी हिंदी और अंग्रेजी बोलने वाले अफसरों के समक्ष नहीं रख पाते थे वह अब अपनी बातें अपने गांव टोले में ही रख कर अपने लिए नियम कायदा बनाते थे यह कानून ग्राम स्वराज का सबसे महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर देखा जा सकता है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने वन अधिकार कानून और आरटीआई से जुड़े हुए कई मुद्दों पर प्रकाश डाला और बताया कि वास्तव में आरटीआई और पारदर्शिता का कानून एक महत्वपूर्ण कानून है जिसने आमजन को शक्ति प्रदान की है। श्री रावत ने कहा कि आरटीआई कार्यकर्ताओं के लिए यह आवश्यक है कि वह आदिवासियों के अधिकारों और वनाधिकार कानून से संबंधित वह समस्त अभिलेख और दस्तावेज निकलवाने में आरटीआई दायर करें जिससे यह समस्त जानकारी केंद्रीय स्तर पर जिला मुख्यालय अथवा राज्य सरकार के पोर्टल पर उपलब्ध हो सके जहां से इसे आसानी से प्राप्त किया जा सके। क्योंकि यदि पारदर्शिता बढ़ती है तो सभी को यह पता चलेगा कि कहां किस स्थान पर कितनी जमीन है और उसका अधिकार किसको प्राप्त है साथ में वन संपदा के विषय में भी जानकारी मिलेगी। आज सबसे बड़ी समस्या यही है कि यह सब जानकारी आमजन को साझा नहीं की जा रही है।

आदिवासियों के लिए 20 वर्ष तक कार्य किया और ब्यूरोक्रेसी से बहुत कम सहयोग प्राप्त हुआ – सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण पटेल

कार्यक्रम में अगले वक्ता के तौर पर सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण पटेल ने अपने अनुभव साझा किए और उन्होंने कहा कि हमने छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा आदि जगह पर आदिवासियों के बीच में 20 वर्ष से अधिक कार्य किया है और जमीन से जुड़े हुए मुद्दों को उच्च स्तर तक उठाया है। उन्होंने कहा ऐसे कई बार आया है जहां पर आदिवासियों के साथ सरकार और पूंजीपतियों ने काफी जुल्म किया और उनके अधिकारों का हनन किया जिसे उनके टीम के सदस्यों ने उच्चतम स्तर तक उठाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत जैसे अधिकारी बहुत कम मिले हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को प्रमोट किया हो। उन्होंने कहा कि अधिकतर ऐसे ब्यूरोक्रेट्स मिलते थे जो डेमोरलाइज करने का कार्य करते थे और हतोत्साहित करने के साथ-साथ झूठे मामलों में फंसाने और अनैतिक दबाव देने का प्रयास करते थे जिसकी वजह से उनके अभियान में काफी समस्या पैदा हो रही थी। उन्होंने कहा की इस बाबत कार्य करते समय उनके ऊपर कई बार हमले भी किए गए और सरकारी तंत्र द्वारा उन्हें नक्सल भी घोषित करने का प्रयास किया गया लेकिन वह अपने काम में रुके नहीं और अंत तक लगे रहे जिसमें उन्हें काफी हद तक सफलता भी प्राप्त हुई है।

 कार्यक्रम में पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप एवं पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया की वनाधिकार और आदिवासियों के अधिकार से संबंधित मामलों पर सूचना आयोग में पैरवी की और काफी जानकारियां पब्लिक डोमेन में साझा करवाने में मदद की है। सूचना आयुक्तों ने उपस्थित आरटीआई कार्यकर्ताओं को भी इस विषय पर कार्य करने के लिए प्रेरित किया। इस बीच उपस्थित पार्टिसिपेंट्स ने आरटीआई से संबंधित दर्जनों प्रश्न पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी से पूछे जिसका उन्होंने जवाब दिया।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया जबकि सहयोगियों में देवेंद्र अग्रवाल अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा वीरेंद्र ठक्कर पवन द्विवेदी सम्मिलित रहे।

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National Breaking: मुक्तिधाम चोरी मामले में नया मोड़, पुरातात्विक सर्वेक्षण तकनीक से जांच प्रारंभ,आखिर कहां गया मुक्तिधाम, अब ऑटो लेवल मशीन से चौथी बार हुई जांच

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ग्रामीण यांत्रिकी सेवा रीवा के कार्यपालन यंत्री आरएल कोकोटे ने तीसरी बार की जांच।

मुक्तिधाम के अवशेषों की पुरातात्विक विधि से हो रही तलाश।

अलग-अलग लोकेशन पर मशीन रख कर खोजे जा रहे सबूत।

ग्रामीणों का मानना कि राशि हजम करने के उद्देश्य से 15 किलोमीटर दूर जंगल और अगम्य पहाड़ी रास्तों के बीच में बनाया गया होगा मुक्तिधाम।

दिनांक 13 सितंबर 2022 रीवा। रीवा मध्य प्रदेश के सेदहा पंचायत के बहुचर्चित मुक्तिधाम चोरी मामले में एक नया मोड़ आ गया है। प्राप्त ताजा जानकारी अनुसार मुक्तिधाम चोरी मामले में अब चौथे राउंड की जांच हो चुकी है। दिनांक 12 सितंबर 2022 को ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग रीवा में अधीक्षण यंत्री कार्यालय में पदस्थ कार्यपालन यंत्री आर एल कोकोटे की टीम ने चौथी बार मुक्तिधाम चोरी मामले में अपनी जांच पूरी की। गौरतलब है कि इसके पहले कार्यपालन यंत्री कोकोटे और उनकी टीम के द्वारा दो बार एवं कमिश्नर रीवा संभाग के द्वारा अनुविभागीय एवं दंडाधिकारी सिरमोर नीलमणि अग्निहोत्री की टीम के द्वारा राजस्व स्तर की भी जांच की जा चुकी है। लेकिन यह मुक्तिधाम है कि मिलने का नाम नहीं ले रहा है जिससे आमजन में भी काफी कौतूहल व्याप्त है। सभी की जुबान पर बस एक ही चर्चा चल रही है कि आखिर मुक्तिधाम सेदहा पंचायत से गया तो गया कहां। बड़ी मजेदार बात यह है जो पत्थर से बना हुआ एक स्ट्रक्चर सुदूर 15 किलोमीटर दूर पथरीले और जंगली भूभाग में पाया गया है वह पत्थरों से बनी हुई वाड़ी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है क्योंकि वहां पर मुक्तिधाम जैसा कुछ प्रतीत नहीं होता।

बिना एनओसी अन्य पंचायती आराजी में बनाये गए मुक्तिधाम की सम्पूर्ण वसूली और एफआईआर क्यों नही?

अब सवाल यह है कि क्या जंगली भूभाग में आम जनता से दूर जहां पैदल भी चलने योग्य रास्ता न हो उस स्ट्रक्चर को क्या कोई भी जांच टीम मुक्तिधाम मानेगी? सवाल यह भी है की तकनीकी स्वीकृति के आधार पर जो कार्य सेदहा ग्राम पंचायत की आराजी नंबर 3 में किया जाना था यदि वह हिनौती ग्राम पंचायत के गदही ग्राम की अन्य आराजी में बिना किसी एनओसी के मात्र भ्रष्टाचार करने और राशि हजम करने के उद्देश्य से बना दिया जाए तो क्या उसे जांच टीम मान्य करेगी और क्या ऐसे कार्यों में संपूर्ण वसूली निर्धारित नहीं होगी? इस प्रकार की चर्चाएं और सवाल आज मुक्तिधाम चोरी मामले में हो रही जांच में रुचि रखने वाले सभी ग्रामीणजनों और लोगों में प्रमुख रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों का यह भी मानना है कि सुदूर जंगली पथरीले भूभाग में 15 किलोमीटर दूर बनाए गए स्ट्रक्चर को यदि मुक्तिधाम मान भी लिया जाए तो 15 लाख रुपये टैक्स के पैसे की हुई बर्बादी से मुक्तिधाम की क्या उपयोगिता? सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी की ममानें तो मुक्तिधाम भ्रष्टाचार के मामले में वसूली के साथ-साथ दोषियों के विरुद्ध आईपीसी की धारा 409 और 420 के तहत एफ आई आर दर्ज की जानी चाहिए।

पुरातात्विक सर्वेक्षण पद्धति की तरह कार्यपालन यंत्री की टीम ने एक बार पुनः की जांच

गौरतलब है कि ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग रीवा के कार्यपालन यंत्री आरएल कोकोटे की टीम के द्वारा इसके पहले दो बार जांच की जा चुकी है जिसमें मुक्तिधाम तलाशने का भरपूर प्रयास किया जा चुका है। लेकिन मुक्तिधाम ढूंढा नहीं जा सका था। इसके साथ ही एसडीएम सिरमोर की भी राजस्व स्तर की जांच पूर्ण हो चुकी है जिसमें यह साबित हो चुका है कि मुक्तिधाम सेदहा ग्राम पंचायत में नहीं बना हुआ है। पर सवाल यह भी था कि जो भी स्ट्रक्चर ग्रामीण क्षेत्र से लगभग 15 किलोमीटर दूर सुदूर जंगली और पथरीले भूभाग में पाया गया आखिर वह था क्या? क्या वह मुक्तिधाम था अथवा प्राचीन बौद्ध काल के समय पत्थरों को इकट्ठा कर बनाया गया कोई पुरातात्विक नमूना था जिसे अब पुरातात्विक धरोहर घोषित की जाए। इसी बात पर जांच टीम ने ऑटो लेवल मशीन और अन्य तकनीकों का प्रयोग करते हुए कई दर्जन स्पॉट चिन्हित किए जहां जमीन की सतह का ऊपरी लेबल प्राप्त करने का प्रयास किया गया। लेबल प्राप्त करने में कई बार ऑटो लेवल मशीन को पत्थर से बने हुए स्ट्रक्चर के अंदर अलग-अलग लोकेशन पर रखकर जानकारी प्राप्त करने के प्रयास किए गए और कई बार पथरीले स्ट्रक्चर के बाहर से भी अलग-अलग लोकेशन को ट्रेस करने का प्रयास किया गया और लेबल प्राप्त करने का प्रयास किया गया।

इस प्रकार दिनांक 12 सितंबर 2022 की मुक्तिधाम चोरी मामले को खोजने के भरपूर प्रयास किए गए लेकिन मुक्तिधाम था कि मिलने का नाम नहीं ले रहा था। आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में भी काफी कौतूहल है कि आखिर यह क्या बला है कि 4 बार जांच होने के बाद भी यह मुक्तिधाम खोजे नहीं मिल रहा है।

हालांकि अब उम्मीद की जा सकती है चौथी जांच के बाद शायद कुछ निष्कर्ष निकले।

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National Breaking: वर्चुअल कोर्ट ही भारत का भविष्य, अब सरकार अधिनियम लाये, 115वें आरटीआई वेबिनार में विशिष्ट अतिथियों ने भारत में पेंडिंग केसों के विषय में चर्चा की

यदि पेंडेंसी कम करना है और लोगों की दिक्कतें कम करना है तो वर्चुअल कोर्ट ही समाधान।

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समय और पैसा बचता है, मानसिक तनाव से फुर्सत मिलती है।

पर्यावरण के लिए भी उचित क्योंकि ई-फाइलिंग से कागजों के बोझ से मिलती है मुक्ति।

दिनांक 4 सितंबर 2022 रीवा। वर्चुअल कोर्ट ही भारत का भविष्य है और अब सरकारों को इसके लिए अधिनियम पारित करना चाहिए। वर्चुअल कोर्ट के माध्यम से भारत के विभिन्न न्यायालयों में पेंडिंग पड़े हुए प्रकरणों का जल्दी और त्वरित गति से निपटारा करने और समय, मेहनत एवं पैसे की बचत करने हेतु इस नई व्यवस्था को लागू किया जाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

इस विषय पर 115 में राष्ट्रीय आईटीआई वेबीनार में उपस्थित विशेषज्ञ इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस राजीव लोचन मेहरोत्रा, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेष गांधी, लॉ कॉलेज के रिटायर्ड प्रोफेसर अश्विन कारिया, मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह, पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप, आरटीआई एक्टिविस्ट भास्कर प्रभु एवं विजय सिंह पालीवाल, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी सहित अन्य पार्टिसिपेंट्स ने वेबीनार के दौरान बात कही।

न्यायालयों में पेंडिंग केसों को कम करने और त्वरित न्याय उपलब्ध कराने में वर्चुअल कोर्ट मददगार – जस्टिस राजीव लोचन मेहरोत्रा

115 वें वेबिनार में उपस्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस राजीव लोचन मेहरोत्रा ने कहा कि आज कोर्ट में पेंडेंसी काफी तेजी से बढ़ रही है और आम व्यक्ति के लिए न्याय सुलभ नहीं हो पा रहा है। कोर्ट ज्यादातर सामर्थ्यवान लोगों का अड्डा बन गया है जहां पर अपराधी अपराध करके अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि मामले की सुनवाई में दशकों बीत जाएंगे और उम्र व्यतीत होने के बाद कब फैसला आएगा इसका कोई पता नहीं। गरीब सामान्य व्यक्ति न्यायालयों तक अपनी पहुंच नहीं बना पाता क्योंकि दशकों चलने वाले प्रकरणों में पैसा और समय उनके पास नहीं रहता। ऐसे में आज भारत की न्याय व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए समस्त तकनीकी प्रयोगों को अपनाना पड़ेगा और न्यायालयों की पेंडेंसी को कम करना पड़ेगा। इसमें न्यायाधीशों के साथ सरकार प्रशासन और अधिवक्ताओं का एकजुट होकर प्रयास करना होगा। पूर्व न्यायाधीश ने कोर्ट पेंडेंसी से जुड़ी हुई कई दिक्कतों के विषय में विस्तार से चर्चा किये और सबको मिलकर समस्या के समाधान के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया।

पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से भी वर्चुअल हियरिंग आवश्यक – शैलेष गांधी

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने वर्चुअल कोर्ट से जुड़े हुए विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से भी वर्चुअल हियरिंग आवश्यक हो जाती है क्योंकि इसमें अनावश्यक कागजों का बोझ खत्म होता है और इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग के माध्यम से आसानी से काम किया जा सकता है। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान दशकों पूर्व किए गए इन प्रयोगों पर कहा की ऐसी व्यवस्थाएं केंद्रीय सूचना आयुक्त रहते समय अपने कार्यालय में उन्होंने लाई जिससे उन्हें 4 वर्ष के कार्यकाल के दौरान 20 हज़ार से अधिक प्रकरणों का निपटारा करने में आसानी हुई। शैलेश गांधी देश के पहले सूचना आयुक्त रहे जिन्होंने यह व्यवस्था अपने कार्यालय में लागू की। उन्होंने कहा कि इससे व्यक्ति को धन सेहत समय सभी की बचत होती है। जिस प्रकार भारतीय न्यायालयों में प्रकरणों की पेंडेंसी 5 करोड़ के ऊपर जा रही है ऐसे में वर्चुअल कोर्ट ही एकमात्र समाधान है जिसे सभी पक्षों को सकारात्मक भाव से स्वीकार करते हुए भारतीय न्यायिक व्यवस्था में अंगीकार किया जाना चाहिए।

हमने क्या निर्णय दिया यह ऑनलाइन मौजूद रहता है जिससे निर्णय में संदेह नहीं होता- राहुल सिंह

मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की वर्तमान समय में उन्होंने फेसबुक लाइव के माध्यम से मप्र सूचना आयोग की सुनवाई ऑनलाइन प्रारंभ की जिसमें सुनवाई से संबंधित विजुअल किसी भी समय ऑनलाइन प्राप्त किया जा सकता है। जिससे यदि मामला हाईकोर्ट अथवा किसी अन्य कोर्ट में चैलेंज किया जाता है तो सबूत के तौर पर विसुअल मौजूद रहता है। राहुल सिंह ने यह भी कहा कि व्यवहारिक दृष्टि से भी यह उत्तम व्यवस्था है क्योंकि बंद कमरे में सुनवाई में कई बार दुर्व्यवहार भी किया जा सकता है लेकिन जब सुनवाई का लाइव प्रसारण होता है तो ऐसे में सब ऑनलाइन रिकॉर्ड हो जाता है जिससे अपने व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए व्यक्ति बाध्य होता है। मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त ने कहा कि कई बार अधिकारियों को सुनवाई में उपस्थित होने के लिए दो से तीन दिवस का समय व्यर्थ हो जाता है लेकिन सुनवाई मात्र आधे घंटे से 45 मिनट तक ही होती है ऐसे में वर्चुअल सुनवाई एक बेहतर व्यवस्था है जिसमें समय धन और तनाव से छुटकारा मिलता है।

सभी की राय वर्चुअल कोर्ट ही न्यायिक व्यवस्थाओं के समस्या का समाधान

इसी प्रकार कार्यक्रम में पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने भी वर्चुअल कोर्ट पर अपने विचार रखते हुए कहा कि यह समय की मांग है और इस व्यवस्था को लागू करने से काफी फायदे हैं। कार्यक्रम में आरटीआई एक्टिविस्ट विजय सिंह पालीवाल, नेशनल फेडरेशन के संयोजक प्रवीण पटेल, एक्टिविस्ट भास्कर प्रभु, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा एवं लॉ कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अश्विन कारिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए और सभी ने कहा कि वर्तमान समय में जब न्यायालयों में प्रकरणों की पेंडेंसी बढ़ती जा रही है ऐसे में समय और धन दोनों की बचत होगी और व्यक्ति को सुनवाई के लिए व्यर्थ में जाने वाले सप्ताह भर के समय से होने वाले मानसिक और शारीरिक तनाव से छुटकारा मिलेगा।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा छत्तीसगढ़ से देवेंद्र अग्रवाल वरिष्ठ पत्रिका पत्रकार मृगेंद्र सिंह सम्मिलित रहे। आरंभिक कार्यक्रम का कोऑर्डिनेशन प्रोफेसर अश्विन कार्य के द्वारा किया गया।

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National Breaking: हाईकोर्ट द्वारा सूचना आयुक्तों पर लगाए गए कॉस्ट पर आयोजित हुआ 114 वां राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार

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मध्य प्रदेश सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त अरविंद कुमार शुक्ला के ऊपर हाई कोर्ट जबलपुर द्वारा लगाए गए 2 हज़ार रूपये के कॉस्ट पर आयोजित हुआ कार्यक्रम

पूर्व केंद्रीय सूचना शैलेश गांधी, मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह और आत्मदीप की उपस्थिति में आयोजित हुआ वेबिनार

सैकड़ों आरटीआई कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम में लिया हिस्सा

दिनांक 28 अगस्त 2022 रीवा मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग एक बार पुनः सुर्खियों में है। इस बार सुर्खियों में होने का कारण इनके द्वारा दिए जाने वाले कोई जनहित में आदेश नहीं है बल्कि मध्य प्रदेश राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त अरविंद कुमार शुक्ला के ऊपर अभी हाल ही में प्रदीप कुमार श्रीवास्तव सहायक ग्रेड 3 के द्वारा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में दायर याचिका क्रमांक 1352/2022 है जिसमें मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग को पार्टी बनाए जाने पर युगल पीठ के जज शील नागू और अरुण कुमार शर्मा द्वारा एक आदेश जिसमें युगल पीठ जजों द्वारा लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी की गलती को लेकर मध्य प्रदेश राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त अरविंद कुमार शुक्ला के ऊपर 2 हज़ार रुपये की कॉस्ट लगा दी गई है। जानकारों की माने तो कॉस्ट एक ऐसे जुर्माने की प्रकृति होती है जिसमें राशि अधिकारी या लोक प्राधिकारी की स्वयं की जेब से न भरी जाकर सरकारी खजाने से भरी जाती है।

बताया गया कि इस विषय पर मुख्य सूचना आयुक्त अरविंद कुमार शुक्ला की तरफ़ से मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग द्वारा पुनरीक्षण याचिका क्रमांक 795/2022 हाई कोर्ट जबलपुर में दायर की गई थी लेकिन उस पर भी सूचना आयुक्त को कोई राहत नहीं मिली है और कॉस्ट यथावत रखी गई है।

हाईकोर्ट जबलपुर ने मुख्य सूचना आयुक्त पर जड़ा 2 हज़ार रुपये का कॉस्ट, सूचना आयोगों में मच गया हड़कंप

उक्त मामले को लेकर दिनांक 28 अगस्त 2022 को मध्य प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह की अध्यक्षता एवं पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप के विशिष्ट आतिथ्य में 114 वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार का आयोजन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में देश के विभिन्न कोनो से आरटीआई आवेदकों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में इस आदेश के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई जिसमें चर्चा में शामिल होने वाले एक्टिविस्टों में छत्तीसगढ़ से देवेंद्र अग्रवाल, जोधपुर राजस्थान से सुरेंद्र जैन, राजस्थान से अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट ताराचंद जांगिड़ एवं उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर आदि सम्मिलित हुए।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पधारे हुए पार्टिसिपेंट्स ने अपने प्रश्न भी रखें जिनके समाधान उपस्थित विशेषज्ञों के द्वारा दिए गए।

पार्टिसिपेंट्स ने कहा आदेश सही, तो सूचना आयुक्तों ने करार दिया अवैधानिक

आयोजित कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने कहा की सूचना आयोग एक क्वासी ज्यूडिशियलl संस्था है जिसके आयुक्तों के ऊपर किसी भी प्रकार की कॉस्ट लगाया जाना कानूनी तौर पर जायज नहीं है। स्वयं उपस्थित सूचना आयुक्त आत्मदीप ने मामले पर संदेह जाहिर करते हुए कहा कि यह आदेश कानूनी स्तर पर अवैधानिक है और कानून में इस प्रकार के प्रावधान नहीं है जहां एक सूचना आयुक्त के ऊपर जुर्माना या कॉस्ट लगाया जाए। उन्होंने इसकी वैधता पर सवाल खड़ा किए वहीं दूसरी तरफ पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने भी सूचना आयोगों के आदेश के विरुद्ध दायर होने वाले रिट पिटिशन पर भी सवाल खड़ा किए और कहा कि सबसे पहले हाईकोर्ट को स्टे देने और कोई भी मामला लेने के पहले यह देखना चाहिए कि वह रिट जूरिडिक्शन में आता है अथवा नहीं। उन्होंने सूचना आयुक्तों पर कॉस्ट लगाने सम्बन्धी इस प्रकार की कार्यवाही को अवैधानिक और गैरकानूनी करार दिया और कहा कि इस प्रकार की प्रैक्टिस बंद की जानी चाहिए। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने कहा कि आम जनता को भी गलत निर्णय ऊपर ताली नहीं बजानी चाहिए जिससे एक गलत परंपरा का जन्म हो। हम सबको मिलकर जहां भी गैरकानूनी आदेश जारी किए जाते हैं अथवा कानून के विरुद्ध कोई कार्य होता है उस पर मिलकर विरोध करना चाहिए और आवाज बुलंद करनी चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में हाई कोर्ट जबलपुर के अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, वरिष्ठ पत्रिका समूह के पत्रकार मृगेंद्र सिंह एवं अन्य सहयोगी मौजूद रहे।

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National Breaking: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने चुनाव सुधार पर 113 वें वेबिनार को किया संबोधित

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सूचना आयुक्त राहुल सिंह की अध्यक्षता में आयोजित हुआ कार्यक्रम // पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेष गांधी एवं मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने भी किया संबोधित।।

दिनांक 21 अगस्त 2022 रीवा मध्य प्रदेश

वैश्विक परिवेश में भारतीय चुनाव सुधार की स्थिति एवं सूचना के अधिकार विषय पर आयोजित 113 वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार में भारत के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने अपने विचार व्यक्त करते हुए चुनावों की स्थिति और चुनाव सुधार पर बताया कि आज भारत विश्व में एक आदर्श डेमोक्रेसी के तौर पर माना जा रहा है जिसमें बेहतर और शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव कराए जाते हैं। उन्होंने इलेक्टोरल बांड, राजनीतिक पार्टियों के सूचना के अधिकार के दायरे में आने एवं जनप्रतिनिधियों एवं अभ्यर्थियों के आपराधिक रिकॉर्ड चल अचल संपत्ति आदि के ब्योरे एवं चुनाव के दौरान इलेक्ट्रॉनिक तरीके से प्राप्त होने वाली शिकायतों और उस पर होने वाली त्वरित कार्यवाही आदि के विषय में भी अपने विचार विस्तार से रखें।

कार्यक्रम में मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी एवं पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप सहित फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के ट्रस्टी प्रवीण पटेल सहित अन्य पार्टिसिपेंट्स ने भी अपने विचार रखे।

वेबीनार में मध्य प्रदेश सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने बताया कि उनके द्वारा त्रिस्तरीय पंचायती चुनावों में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से पंचायत अभ्यर्थियों के चल अचल संपत्ति आपराधिक रिकॉर्ड एवं शपथ पत्र आदि की जानकारी सार्वजनिक करने के आदेश दिए गए थे लेकिन मध्य प्रदेश चुनाव आयोग सहित सामान्य प्रशासन विभाग ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसके विषय में एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी के द्वारा जनहित याचिका भी हाई कोर्ट जबलपुर में दायर की गई है जिसके बाद आनन-फानन में कार्यवाहीयों का दौर प्रारंभ हुआ है और यह समस्त जानकारी पब्लिक पोर्टल पर साझा की जा रही है। कार्यक्रम में पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने भी चुनाव सुधारों के विषय में विस्तार से चर्चा की एवं राउंडटेबल डिस्कशन के दौरान पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत से विभिन्न प्रकार के प्रश्न किए।

कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने भी अनैतिक तरीके से जनप्रतिनिधियों के द्वारा झूठे वादे कर और झूठ बोलकर आम जनता को गुमराह करने के विषय में अपने विचार रखे और कहा कि इस प्रक्रिया पर रोक लगाई जानी चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे और इलेक्टोरल बांड सहित पारदर्शिता के सवाल पर भी विस्तार से चर्चा हुई और विभिन्न प्रकार से पार्टिसिपेंट्स ने प्रश्न पूछे कि आखिर राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने में क्या दिक्कत हो रही है।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया जिसमें सहयोगियों में वरिष्ठ पत्रिका पत्रकार मृगेंद्र सिंह, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, शिवेंद्र मिश्रा और छत्तीसगढ़ से देवेंद्र अग्रवाल के साथ किया गया।

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National Breaking: गुजरात सूचना आयोग का आरटीआई आवेदकों पर बैन सम्बन्धी तुगलकी फरमान गैरकानूनी असंवैधानिक – पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी

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गुजरात सूचना आयोग द्वारा 12 आरटीआई आवेदकों को आवेदन करने पर बैन लगाने पर भड़के देश भर के आरटीआई कार्यकर्ता

आरटीआई कार्यकर्ताओं ने कहा ऐसे सूचना आयुक्तों को बर्खास्त किया जाए अन्यथा पूरे देश में होगा आंदोलन

लोकहित के व्यापक मामले पर आयोजित हुआ 112 वां आरटीआई वेबीनार।

दिनांक 14 अगस्त 2022 रीवा मध्य प्रदेश। गुजरात सूचना आयोग के दो ब्यूरोक्रेटिक बैकग्राउंड से जुड़े हुए सूचना आयुक्तों के द्वारा अभी हाल ही में 2020 से लेकर अब तक कुल 12 आरटीआई कार्यकर्ताओं को आरटीआई आवेदन लगाने, उनकी अपील सुनने और सूचना आयोग में उनकी सुनवाई करने पर बैन लगाने संबंधी मुद्दों को लेकर 112 वां राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार का आयोजन किया गया जिसमें देश के विभिन्न कोनों से वरिष्ठ आरटीआई एक्टिविस्ट एवं पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने शिरकत की।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर गुजरात माहिती अधिकार पहल की संस्थापक और आरटीआई हेल्पलाइन की प्रायोजक सुश्री पंक्ति जोग सहित आरटीआई एक्टिविस्ट भास्कर प्रभु, राजस्थान से वरिष्ठ वकील एवं आरटीआई एक्टिविस्ट ताराचंद्र जांगिड़, पीएस जाट, उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर एवं छत्तीसगढ़ से देवेंद्र कुमार अग्रवाल सहित सैकड़ों की संख्या में आरटीआई एक्टिविस्ट सम्मिलित हुए और पूरे देश में विभिन्न सूचना आयोगों के द्वारा जारी किए जा रहे तुगलकी फरमानों पर आक्रोश जाहिर किया और इसके विरोध में खुलकर आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

सूचना आयुक्तों के द्वारा आरटीआई आवेदक पर आवेदन पर बैन एक तरह का तुगलकी फरमान – पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी

उधर मामले में अपना पक्ष रखते हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने बताया कि सूचना आयुक्त सूचना के अधिकार कानून की मूल भावना से हटकर आदेश जारी कर रहे हैं जिनका न तो भारतीय संविधान और न ही आरटीआई कानून से ही कोई लेना देना है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि इस प्रकार के आदेश पूरी तरह से अवैधानिक हैं और संविधान की मूल भावना के विपरीत है और साथ में मानवाधिकार का खुला उल्लंघन है। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त द्वारा बताया गया कि देश के अंदर कोई भी कानून किसी भी व्यक्ति को आरटीआई आवेदन लगाने से नहीं रोक सकता है। यहां तक कि जेल में बंद और क्रिमिनल व्यक्ति को भी सूचना का अधिकार कानून का उपयोग कर अपने आप को निर्दोष साबित करने का पूरा अधिकार होता है। ऐसे में ब्यूरोक्रेटिक बैकग्राउंड से आने वाले ऐसे सूचना आयुक्त आरटीआई कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं और खुलेआम आरटीआई कानून का उल्लंघन कर रहे हैं जिन्हें आरटीआई कानून की एबीसीडी भी नहीं पता। ऐसे आदेशों के विरुद्ध आरटीआई कार्यकर्ताओं और आम जनता को सड़क पर उतरने की जरूरत है और सब कुछ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट पर ही नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने आदित्य बंदोपाध्याय और गिरीश रामचंद्र देशपांडे आदि जैसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहा कि यह ऐसे आदेश हैं जिनका हवाला देकर आज अधिकतर जानकारी आम जनता से दूर रखी जा रही है और आरटीआई कानून का मजाक बनाया जा रहा है। इसलिए कोर्ट को अपना काम करने दें और उस पर ज्यादा उम्मीद न रखें और समस्त आरटीआई उपयोगकर्ताओं को एकजुट होकर पूरे देश में एक अभियान चलाना चाहिए और एक पब्लिक ओपिनियन बनाना पड़ेगा तभी आरटीआई कानून को बचाया जा सकता है अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब इस प्रकार तुगलकी फरमान जारी कर पूरे आरटीआई कानून का सत्यानाश कर दिया जाएगा।

गुजरात हाई कोर्ट द्वारा माहिती अधिकार पहल की पिटीशन खारिज कर लगाया गया जुर्माना – पंक्ति जोग

गुजरात से वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता एवं माहिती अधिकार पहल की संयोजक आरटीआई एक्टिविस्ट पंक्ति जोग द्वारा बताया गया कि उन्होंने इन सभी मामलों को लेकर एक रिट पिटिशन हाई कोर्ट गुजरात में माहिती अधिकार पहल के माध्यम से लगाई थी लेकिन कोर्ट ने मामले को सुनने से ही इंकार कर दिया और पिटीशन को खारिज करते हुए उल्टा संगठन के ऊपर जुर्माना लगा दिया। हालांकि इसमें हाई कोर्ट से पीआईएल में जाने की अपील की गई थी लेकिन सुनवाई नहीं हुई। पंक्ति जोग ने बताया कि इस प्रकार के मामले आरटीआई कानून को कमजोर कर रहे हैं और हम सब को एकत्रित होकर न केवल गुजरात में बल्कि पूरे देश में एक अभियान चलाना पड़ेगा और इसके लिए सभी आरटीआई कार्यकर्ताओं के सुझाव आमंत्रित हैं। इस मामले को और कैसे बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है सभी आरटीआई कार्यकर्ता अपने सुझाव अवश्य दें। उन्होंने बताया कि सूचना आयुक्तों का इस प्रकार तुगलकी फरमान जारी हुआ जिसमें 12 आरटीआई आवेदकों के आरटीआई आवेदन पर बैन लगा दिया गया है तब से उनका संगठन और आरटीआई एकता मंच नामक संगठन के द्वारा यह प्रयास किए जा रहे हैं कि किसी भी आरटीआई आवेदक के मामले की सुनवाई तुगलकी फरमान जारी करने वाले ऐसे सूचना आयुक्तों की कोर्ट में हो ही नहीं ।

धारा 4 की पालना किए बिना ऐसे तुगलकी फरमान अंग्रेजियत की याद दिलाते हैं – भास्कर प्रभु

उधर 75 वर्ष स्वतंत्रता प्राप्त किए हुए व्यतीत होने के बाद आज जब देश तिरंगा यात्रा में व्यस्त है ऐसे में गुजरात जैसे सूचना आयोग में जारी किए गए तुगलकी फरमान जिसमें आरटीआई आवेदकों को आरटीआई लगाने पर ही बैन कर दिया गया है अंग्रेजी हुकूमत की याद दिलाते हैं। ऐसा लगता है जैसे भारत में अंग्रेजों का राज्य वापस आ रहा है और व्यक्ति को उसके मूल संवैधानिक अधिकार से ही वंचित किया जाने लगा है। भास्कर प्रभु ने कहा कि हम सब को सबसे पहले यदि आरटीआई से जुड़ा हुआ मुद्दा है तो यह देखने की आवश्यकता है कि क्या वह मामला धारा 4 की श्रेणी में आता है और यदि आता है तो पहले वह जानकारी मुफ्त में वेब पोर्टल पर साझा की जानी चाहिए और उसके लिए कोई आरटीआई लगाए जाने की आवश्यकता ही नहीं है। साथ में भास्कर प्रभु ने यह भी कहा कि अक्सर हम आरटीआई आवेदक के बैकग्राउंड को लेकर फालतू के तर्क करते हैं लेकिन यह गलत है क्योंकि आरटीआई कोई क्रिमिनल भी लगा सकता है और कोई सामान्य व्यक्ति भी लगा सकता है। आरटीआई आवेदन करने की पहली कंडीशन यह होती है कि हमें भारतीय नागरिक होना चाहिए। अतः कोई भी भारतीय नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए आरटीआई आवेदन कर सकता है। इसलिए आरटीआई से संबंधित जब बात आए तो वहां आरटीआई के दायरे में ही रहकर स्थिति देखी जाए। यदि व्यक्ति असामाजिक है या क्रिमिनल है इसका आरटीआई से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि आरटीआई में जो बातें पूछी जाती हैं यदि वह जानकारी शासन प्रशासन द्वारा दिए जाने योग्य है तो वह जानकारी दी जानी चाहिए और व्यक्ति के सामाजिक बैकग्राउंड का कोई उल्लेख आरटीआई आवेदन या सूचना आयोगों द्वारा जारी किए जाने वाले आदेशों में नहीं होना चाहिए। आज देश के तमाम सूचना आयोगों में जो ट्रेंड चल रहा है वह पूरी तरह से चिंताजनक है और भारतीय संविधान की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है जिसका पुरजोर विरोध किए जाने की जरूरत है।

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National Breaking: सूचना के अधिकार के मूलभूत सिद्धांतों पर शैलेश गांधी द्वारा दी गई जानकारी, स्पेशल वर्कशॉप में आरटीआई कानून से जुड़े हुए तकनीकी और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आयोजित हुआ वेबीनार

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने आरटीआई आवेदकों को दी विशेष जानकारी।

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दिनांक 6 अगस्त 2022 रीवा। सूचना के अधिकार कानून को लेकर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी द्वारा एक आरटीआई वर्कशॉप में उद्बोधन वेबीनार के माध्यम से दिया गया। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर स्वयं शैलेष गांधी मौजूद रहे।

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने अपने 1 घंटे के उद्बोधन में आरटीआई कानून से जुड़े हुए महत्वपूर्ण और मूलभूत बातों पर जोर दिया और आरटीआई कैसे लगाएं कब लगाएं कहां लगाएं उसके लिए निर्धारित शुल्क और कितने दिनों में जानकारी दी जाए और यदि जानकारी न मिले तो प्रथम एवं द्वितीय अपील कब कहां कैसे करें आदि बिंदुओं से लेकर धारा 8, 9 एवं धारा 11 जिसमें कुछ विशेष परिस्थितियों में सूचना नहीं दिए जाने का भी प्रावधान रहता है जैसे कई मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करते हुए पार्टिसिपेंट्स के प्रश्नों के भी उत्तर दिए।

बता दें की पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी अपने 4 वर्ष के सेंट्रल इनफॉरमेशन कमिश्नर के कार्यकाल के दौरान 20 हज़ार से से अधिक प्रकरणों का निपटारा किया और साथ में कई करोड़ रुपए की के जुर्माने भी लगाए। आरबीआई से जुड़े हुए एक मामले जिसमें उन्होंने गवर्नर को ही डीम्ड पीआईओ बना दिया था एक बेहद रोचक मामला है। शैलेश गांधी आईआईटी बॉम्बे से अंडर ग्रेजुएट रहे हैं और उन्होंने अपनी कंपनी को छोड़कर सामाजिक सेवा एवं आरटीआई आंदोलन में सहभागिता निभाई है। एनसीपीआरआई के सह संयोजक रहे शैलेष गांधी मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ भी मिलकर कार्य किया है। चाहे वह आरटीआई रहा हो अथवा राइट टू फूड या राइट टू एजुकेशन सभी सिविल राइट्स के मुद्दों पर उन्होंने अपने विचार बिना किसी दवाब भेदभाव के साथ स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भाव से रखे हैं। उन्होंने आरटीआई पर कई सारी किताबें भी लिखी हैं जो आज काफी चर्चित हैं। प्रत्येक रविवार सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक आयोजित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के वेबीनार में भी वह अपनी सहभागिता विशिष्ट अतिथि के तौर पर देते हैं। रिटायरमेंट के बाद शैलेष गांधी निरंतर आरटीआई कानून को जन जन तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इसी दिशा में वेबीनार, वर्कशॉप कॉन्फ्रेंस आदि के माध्यम से लोगों से जुड़ते हैं और आरटीआई को कैसे मजबूत बनाया जाए इस विषय पर हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन शनिवार 6 अगस्त 2022 को शाम 5:00 बजे से 6:30 बजे तक किया गया।

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