Tuesday, December 6, 2022
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देर से ज्वाइन करने वालों के लिए आज़ादी की लड़ाई


व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

इसे कहते हैं नहले पर दहला बल्कि आख़िरी गेंद पर छक्का ही कहिए। अब मोदी जी और उनके संघ परिवार को कोई आज़ादी की लड़ाई मिस करने पर ज़रा सा भी ताना मारकर तो देखे। ऐसा मुंह तोड़ जवाब तैयार है कि ताना मारने की दोबारा किसी की हिम्मत नहीं पड़ेगी। और जवाब क्या हक़ीक़त है, ठोस हक़ीक़त! भगवाइयों को बात-बात में उनके आज़ादी की लड़ाई मिस करने की याद दिलाने वाले, भगवाइयों को तो ख़ैर नहीं ही जानते हैं, आज़ादी की लड़ाई को भी बस दूर-दूर से ही जानते हैं। वर्ना आज़ादी की लड़ाई की बात कम से कम भूतकाल की लड़ाई की तरह नहीं करते। माना कि वह भी आज़ादी की ही लड़ाई थी, जिसमें गांधी जी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र, महर्षि अरविंद, सरदार पटेल वग़ैरह के साथ, हेडगेवार, गोलवलकर, मुंजे वग़ैरह नहीं भी तो क्या हुआ, वीर सावरकर तो बाक़ायदा लिखा-पढ़ी में थे। पर आज़ादी की लड़ाई वही तो नहीं थी। आज़ादी की लड़ाई उतनी ही तो नहीं थी।

आज़ादी की लड़ाई उससे पहले भी तो थी। बिरसा मुंडा की लड़ाई, रानी लक्ष्मी बाई की, पंडित मंगल पांडे वग़ैरह की लड़ाई। बल्कि इस देश की आज़ादी की लड़ाई तो अंग्रेज़ों के आने के भी सैकड़ों साल पहले से चल रही थी। शिवाजी, राणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, रानी पद्मिनी और हम तो कहेेंगे कि बहुत ज़्यादा पीछे अशोक, चंद्रगुप्त वग़ैरह के क़िस्सों में नहीं भी जाएं तब भी, थोड़ा और पीछे राजा पोरस तक की लड़ाई। भगवा भाइयों को गांधी, सुभाष, पटेल वग़ैरह वाली आज़ादी की लड़ाई मिस करने के लिए ताने देने वाले, दूसरों के मिसाल के तौर पर लक्ष्मी बाई वाली या उससे भी पहले वाली आज़ादी की लड़ाई मिस करने पर कभी सवाल क्यों नहीं उठाते हैं? भगवा भाइयों ने बीसवीं सदी वाली आज़ादी की लड़ाई मिस भी कर दी तो क्या हुआ, खद्दर वालों ने भी तो अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दियों वाली और उससे भी पीछे की आज़ादी की लड़ाइयां मिस की थीं। यहां कोई नहीं है, जो अतीत की भी आज़ादी की पूरी लड़ाई में शामिल रहा हो, जिसने कभी आज़ादी की लड़ाई मिस ही नहीं की हो। फिर हर वक़्त भगवाइयों के आज़ादी की लड़ाई मिस कर देने पर इतनी किट-किट क्यों?

और ख़ैर अब तो मोदी जी ने पचहत्तर साल बाद, आज़ादी की रुकी हुई लड़ाई दोबारा चालू करा के, भगवाइयों के आज़ादी की लड़ाई मिस करने, नहीं करने का सारा झगड़ा ही ख़त्म कर दिया है। आज़ादी की लड़ाई तो इस समय, आज, अभी भी जारी है और आज़ादी की लड़ाई की इस गाड़ी में, इंजन के फ़ौरन बाद की पहली एसी बोगी, केवल भगवाइयों की सवारी है। अब आलोचक भगवाइयों पर किस मुंह से आज़ादी की लड़ाई मिस करने का इल्ज़ाम लगाएंगे? पहले किसी ने भी नेतृत्व किया हो, अब तो भगवाई ही आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। उल्टे अब तो आज़ादी की लड़ाई में अपनी भूमिका की जो कल तक शान मारते आ रहे थे, उनसे ही इसका जवाब मांगा जाना चाहिए कि आज़ादी की लड़ाई तो आज भी यहां है, पर वे कहां हैं! क्या अब उनकी आज़ादी की लड़ाई को मिस करने की बारी है!

पचहत्तर साल इंतज़ार करना पड़ा तो क्या हुआ, आख़िरकार भगवाइयों के दूसरों से सवाल करने की बारी आ ही गयी। और ऐरों-ग़ैरों से सवाल क्या पूछना, अब तो सीधे नेहरू जी से सवाल पूछना बनता है। सिंपल सवाल–आप तो इतने विद्वान बनते थे, ग़ुलामी की निशानियां मिटाना कैसे भूल गए? पहले पीएम की कुर्सी मिलते ही भूल गए कि हिंदी रूपांतर कर के प्रिंसवे को राजपथ बना देने से, ग़ुलामी की ये निशानी नहीं मिटेगी। उल्टे, प्रिंसवे की जगह, कर्तव्यपथ आने का इस देश को पूरे पचहत्तर साल इंतज़ार करना पड़ा। और सच पूछिए तो मोदी है, इसीलिए प्रिंसवे की जगह, कर्तव्यपथ का साइनबोर्ड मुमकिन है। वर्ना नेहरू-गांधी परिवार के लोग या वंशवादी या भ्रष्टाचारी ही आते-जाते रहते, तो साइनबोर्ड भी बदलने वाला नहीं था; सेंट्रल विस्टा के टूरिस्ट फ्रेेंडली बनने की बात तो छोड़ ही दें।

ज़रा सोचिए, अगर नेहरू जी ने आज़ादी की लड़ाई ख़त्म करने की उतावली नहीं दिखाई होती और योजना वग़ैरह बनाने के बजाए पहले ग़ुलामी के निशानों को मिटाने में राष्ट्र की ताक़त लगायी होती, तो देश का विभाजन भले ही नहीं रुकता, पर हम विश्व गुरु बहुत पहले ही बन चुके होते। ज़्यादा नहीं तो कम से कम ग़ुलामी की निशानी वाले सेंट्रल विस्टा को तुड़वा कर, नये संसद भवन समेत, आज़ादी वाला नया सेंट्रल विस्टा तो नेहरू जी प्रायोरिटी पर बनवा ही सकते थे। आख़िर, ग़ुलामी की सबसे पहले मिटाने वाली यही तो असली निशानी थी। पर वह तो सिर्फ़ यूनियन जैक को हटाकर तिरंगा फहराने में ही जीत मानकर बैठ गए। इसी ग़लती का नतीजा है कि ग़ुलामी की जिस निशानी को मिटाने में अब बीस हज़ार करोड़ लगने हैं, वह काम तब बड़े आराम से हज़ार-पांच सौ करोड़ में ही हो गया होता। सरकारी पैसा भी बचता और हज़ारों लोगों को तभी रोज़गार भी मिल गया होता। अब बेचारे मोदी जी ग़ुलामी की निशानियां न मिटाने की उनकी ग़लती को मिटा रहे हैं और महामारी के टैम मेें फिजूलख़र्ची के लिए, देश में तो देश में, विदेश तक के आलोचकों की गालियां भी खा रहे हैं।

पर शुक्र है कि मोदी जी विरोधियों की गालियों की परवाह करने वालों में से नहीं हैं। इस मामले में उनकी छाती छप्पन इंच से कुछ न कुछ फालतू ही बैठेगी। इस बार लाल क़िले से ही एलान कर दिया था कि ग़ुलामी की किसी भी निशानी को नहीं छोड़ेंगे। चुन-चुनकर, एक-एक निशानी को मिटाया जाएगा। और हाथ के हाथ भाई ने मिटाना शुरू भी कर दिया। सिर्फ़ मिटाना ही नहीं, आज़ादी की निशानियों को लाना भी। जैसे जार्ज पंचम की छतरी के नीचे, सुभाष बाबू की विशाल मूर्ति। पहले वालों ने जार्ज पंचम की मूर्ति तो हटा दी, पर उसकी याद दिलाने को मूर्ति की जगह खाली छोड़ दी। उनसे तो ग़ुलामी की निशानी मिटाकर, उस जगह गांधी जी तक को नहीं बैठाया गया। मोदी जी ने वहां सुभाष बाबू को खड़ा कर दिया, राष्ट्रपति भवन को सलामी देने के लिए।

पर हां, राष्ट्रपति भवन से याद आया। यह भी तो ग़ुलामी के टैम में वाइसराइ का आवास हुआ करता था। क्या ग़ुलामी की इस निशानी को तुड़वा कर दोबारा नहीं बनवाया जाएगा? क्या माउंटबेटन वाले आवास में, द्रौपदी मुर्मू का बसाया जाना ही, ग़ुलामी की निशानी मिटाने के लिए काफ़ी मान लिया जाएगा? खै़ैर! राष्ट्रपति भवन न सही, ग़ुलामी की और बहुत निशानियां मिल जाएंगी मिटाने के लिए और हज़ारों नाम मिल जाएंगे, बदलने के लिए। फिर भी कम पड़ें तो मिटाने के लिए अंग्रेज़ों से पहले वाली ग़ुलामियों की निशानियां भी तो हैं। मिटाने को निशानियां ही निशानियां हैं, बाबरी मस्जिद मिटाने के बाद भी। सो लगे रहो मोदी भाई। आज़ादी के सौवें साल तक भारत, मानव विकास सूचकांक पर ऐसे ही तरक्की करते-करते, नीचे से टॉप पर तो पहुंच ही जाएगा और अडानी जी की दौलत, सारी दुनिया में ऊपर से टॉप पर।

व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।

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