स्मार्ट सिटी में भुगतान पूरा दर्शाया, पर भौतिक प्रगति और क्वालिटी ऑडिट रिपोर्ट छुपाने पर घिरे अफसर; ठेकेदारों पर ‘शून्य’ पेनाल्टी की जांच हो -मनोज सिंह ठाकुर

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रायपुर: भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आधिकारिक पत्रांक: K-15015/1/RTI/2026-SC-I/9210416 (दिनांक 14.09.2026) से रायपुर और बिलासपुर स्मार्ट सिटी मिशन में हुए गंभीर वित्तीय व प्रशासनिक खेल की परतें खुली हैं। अधिवक्ता एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता मनोज सिंह ठाकुर ने इस संदर्भ में राज्य शासन, मुख्य सचिव एवं स्मार्ट सिटी एसपीवी (SPV) प्रशासन को औपचारिक विधिक ज्ञापन सौंपकर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) से उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच एवं सुसंगत विधिक कार्रवाई की मांग की है।


1. 50:50 मैचिंग शेयर का गणित — 1,764 करोड़ का कागजी खर्च
स्मार्ट सिटी मिशन केंद्र व राज्य सरकार की 50:50 हिस्सेदारी वाली योजना है। केंद्र सरकार के पत्र के अनुसार:
रायपुर: केंद्र ने 453 करोड़ दिए और शत-प्रतिशत (453 करोड़) व्यय दर्शाया। राज्य का 50% शेयर मिलाकर रायपुर में कुल 906 करोड़ का व्यय कागजों में दर्ज है।
बिलासपुर: केंद्र ने 429 करोड़ जारी किए और 411 करोड़ खर्च दर्शाए। राज्य का शेयर मिलाकर बिलासपुर में कुल 858 करोड़ (व्यय: 822 करोड़) का फंड दिखाया गया।
कुल व्यय: दोनों शहरों में स्वीकृत कुल 1,764 करोड़ में से 1,728 करोड़ की भारी-भरकम राशि का 100% कागजी व्यय दर्शा दिया गया है।
2. RTI का खुलासा: भुगतान 100%, पर भौतिक सत्यापन और ऑडिट रिपोर्ट गायब
आरटीआई के आधिकारिक दस्तावेजों में सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक ओर केंद्र सरकार पूरे ₹453 करोड़ का 100% भुगतान व उपयोगिता दर्शा रही है, लेकिन जब आरटीआई के बिंदु क्र. 2 और 5 में वास्तविक भौतिक प्रगति (Physical Status) और थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट रिपोर्ट की जानकारी मांगी गई, तो केंद्र ने स्पष्ट किया कि यह रिकॉर्ड उनके पास उपलब्ध ही नहीं है।
बड़ा सवाल यह है कि यदि भौतिक सत्यापन और गुणवत्ता परीक्षण की रिपोर्ट केंद्र के पास मौजूद नहीं थी, तो 100% फंड यूटिलाइजेशन का प्रमाण-पत्र (UC) किस आधार पर जारी और स्वीकार हुआ? यह सीधे तौर पर दर्शाता है कि धरातल पर काम का पुख्ता सत्यापन किए बिना कागजी खेल कर फंड समाप्त दिखा दिया गया।
3. स्मार्ट सिटी के प्रमुख प्रोजेक्ट्स: मियाद खत्म, काम अधूरे, पर पेनाल्टी ‘शून्य’
24×7 प्रेशराइज्ड वाटर सप्लाई स्कीम (रायपुर):
मोतीबाग कमांड एरिया (रमण मंदिर वार्ड, गंज, बैरन बाजार, पुरानी बस्ती) का अनुबंध 2020-21 में 18 माह की अवधि (मध्य 2022 तक पूर्णता) के लिए हुआ था। मियाद खत्म होने के वर्षों बाद तक कार्य लटका रहा। मीडिया रिपोर्टों ने भी उजागर किया कि 24 घंटे जलापूर्ति का दावा पूरी तरह हवा-हवाई साबित हुआ और नागरिकों को मटमैला पानी सप्लाई होता रहा।
कुशालपुर–संतोषी नगर–सुंदर नगर ड्रेनेज प्रोजेक्ट (रायपुर):
2021-22 में निष्पादित अनुबंध की मियाद बीतने के बाद भी ड्रेनेज कार्य अधूरा रहा, जिसके चलते बारिश में 200 से अधिक घरों में नाली का गंदा पानी घुसा और पूरे क्षेत्र में गंभीर जलभराव की स्थिति बनी रही।
इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) व स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम (रायपुर):
करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित ट्रैफिक मैनेजमेंट, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (ANPR) और स्मार्ट कैमरों के मेंटेनेंस का बुरा हाल रहा। तकनीक के नाम पर भारी भुगतान तो हुआ, पर धरातल पर कैमरे और सर्विलांस सिस्टम आए दिन बंद व तकनीकी खामियों से जूझते रहे।
मल्टी-लेवल कार पार्किंग (MLCP) प्रोजेक्ट्स (रायपुर):
कलेक्ट्रेट परिसर एवं प्रमुख बाजारों के निकट करोड़ों की लागत से स्वीकृत मल्टी-लेवल पार्किंग निर्माण में अत्यधिक लेटलतीफी हुई। निर्धारित समय-सीमा खत्म होने के बाद भी संचालन और उपयोगिता आधी-अधूरी रही।
बूढ़ातालाब (स्वामी विवेकानंद सरोवर) सौंदर्यीकरण (रायपुर):
सौंदर्यीकरण और विकास के नाम पर पानी की तरह बहाए गए फंड के बावजूद गुणवत्ता ऑडिट के अभाव में बुनियादी काम और उपकरण देखरेख के अभाव में बदहाल होते रहे।
अरपा रिवरफ्रंट व मंगला एसटीपी (बिलासपुर): 2021-22 का यह अनुबंध 2023 में समाप्त होने के बाद भी अधूरा रहा। स्वयं नगर निगम प्रशासन ने माना था कि मियाद बीतने के बाद भी काम महज 65% ही पूरा हो सका था।
4. अनुबंध समाप्ति से 31 मार्च 2025 तक नियमों की खुली अनदेखी
मंत्रालय के अनुसार स्मार्ट सिटी मिशन 31 मार्च 2025 को आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है। मूल अनुबंधों की अवधि 2021 से 2023 के बीच ही समाप्त हो चुकी थी, किंतु 31 मार्च 2025 तक मिशन के पूरे कार्यकाल में लेटलतीफी करने वाले चहेते ठेकेदारों पर पेनाल्टी और नोटिस की संख्या ‘Nil’ (शून्य) दर्ज रही। अनुबंध के लिक्विडेटेड डैमेज (LD) क्लॉज की खुली अनदेखी कर ठेकेदारों को अनुचित वित्तीय लाभ पहुंचाया गया।
प्रमुख मांगें:
उच्चस्तरीय न्यायिक अथवा EOW जांच: स्मार्ट सिटी मिशन के तहत दोनों शहरों में व्यय हुए संपूर्ण ₹1,764 करोड़ के उपयोगिता प्रमाण-पत्रों, टेंडरों एवं बिना भौतिक प्रगति व क्वालिटी ऑडिट देखे 100% भुगतान करने की निष्पक्ष जांच माननीय उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से कराई जाए अथवा प्रकरण सीधे राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) को कार्रवाई हेतु सौंपा जाए।
दोषी अफसरों व एजेंसियों पर कार्रवाई: नियमों को ताक पर रखकर ठेकेदारों पर पेनाल्टी शून्य रखने वाले तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स (PMC) एवं निर्माण एजेंसियों पर आपराधिक व विधिक जवाबदेही तय कर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
क्वालिटी रिपोर्ट सार्वजनिक हो: रायपुर और बिलासपुर के सभी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स की थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट रिपोर्ट और भौतिक पूर्णता प्रमाण-पत्र जनहित में सार्वजनिक पटल पर रखे जाएं।
समानांतर विधिक कार्रवाई: शासन को विधिक ज्ञापन प्रेषित करने के साथ-साथ, जनहित और शासकीय धन के दुरुपयोग को लेकर माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के समक्ष भी शीघ्र यथोचित विधिक याचिका दायर की जाएगी।



