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लोककला के एक युग का अंत: पद्म विभूषण तीजन बाई के निधन से शोक में डूबा बिलासपुर, शहर का था उनसे गहरा नाता

 

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बिलासपुर। पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी की महान साधिका तीजन बाई के निधन के साथ छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। बिलासपुर से उनका रिश्ता केवल कार्यक्रमों तक सीमित नहीं था, यह शहर उनके सम्मान, स्नेह और सांस्कृतिक स्वीकार्यता का साक्षी रहा। जब-जब तीजन बाई ने बिलासपुर की धरती पर महाभारत की कथा सुनाई, तब-तब श्रोताओं ने लोककला की उस विलक्षण परंपरा को आत्मसात किया।

बिलासपुर तीजन बाई की सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। 19 जुलाई 2016 को जब बिलासपुर विश्वविद्यालय (वर्तमान अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय) ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि देकर सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक लोक कलाकार का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा का सम्मान माना गया। इसके बाद भी वे समय-समय पर शहर के विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल होती रहीं।

बिलासपुर में उनकी अंतिम प्रमुख उपस्थिति चार जुलाई 2025 को आयोजित युवा महोत्सव-2025 में रही, जहां उन्होंने मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता की। इसके अलावा स्पीक मैके सहित कई कार्यक्रमों में आती रही। उनके निधन का समाचार मिलते ही बिलासपुर के साहित्यकारों, लोक कलाकारों, रंगकर्मियों और कला प्रेमियों ने गहरा शोक व्यक्त किया। शहर के सांस्कृतिक जगत का मानना है कि तीजन बाई ने पंडवानी को केवल मंच नहीं दिया, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाकर लोकसंस्कृति को अमर बना दिया।

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