सरकार ने विभाग का बंटवारा किया नहीं:संचालक तीन साल पहले ही संस्कृति विभाग के 17 कर्मचारियों को लेकर चले गए नवा रायपुर

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दो विभागों के बंटवारे का गजब मामला सामने आया है। एक अफसर ने अपने मन से दो विभागों का बंटवारा कर डाला। मामला कुछ ऐसा है कि 6 अक्टूबर 2022 को तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने संस्कृति और पुरातत्व विभाग को अलग करने की घोषणा की। 29 मार्च 2023 को तत्कालीन संचालक विवेक आचार्य ने अपने मन से ही दोनों विभागों के कर्मचारियों का बंटवारा कर डाला।
उन्होंने पुरातत्व संचालनालय के लिए 99 और संस्कृति के लिए 28 पद का सेटअप बनाया। यही नहीं संस्कृति विभाग में 17 कर्मचारियों को लेकर वे राजभाषा कार्यालय नवा रायपुर शिफ्ट हो गए।
यहां उन्होंने 4 लाख रुपए महीने किराया भी देना शुरू कर दिया। एक लाख रुपए कर्मचारियों के आने-जाने पर खर्च हो रहा है। कुल 38 महीनों में 2 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुका है। अब मंत्री राजेश अग्रवाल के निर्देश पर शासन स्तर पर दोनों विभागों के बंटवारे की प्रक्रिया शुरू हुई है।
इसके लिए समिति बनाई गई है, जो तय करेगी कि कौन कर्मचारी किस विभाग में रहेगा। यही नहीं संस्कृति विभाग को वापस रायपुर के संग्रहालय में लाने के लिए सचिव को पत्र भी लिखा है।
खंडहर हो गया संग्रहालय संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग का कार्यालय गुरुघासीदास संग्रहालय में छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से चल रहा है। लेकिन 2023 में संस्कृति विभाग के कर्मचारी नवा रायपुर शिफ्ट हुए तो इस इमारत के कई कमरे खाली हो गए।
संचालक विवेक आचार्य भी अधिकांश समय नवा रायपुर ही रहते थे। ऐसे में इस इमारत के मरम्मत पर भी ध्यान कम हो गया। राशि वहां किराए में चली जाने लगी। कलाकारों ने भी कई बार पत्र लिखा कि कार्यालय रायपुर में होना चाहिए। नवा रायपुर आने-जाने में बड़ी समस्या होती है। आरोप यह भी है कि जो 2 करोड़ रुपए किराए में दिए गए उससे कार्यालय की नई इमारत तक बनवाई जा सकती थी।
अफसर की जिद में 3 साल में किराए और आने-जाने में खर्च हो गए 2 करोड़ रुपए, अब मंत्री वापस लेकर आएंगे विभाग
नियमों को तोड़ने की ‘संस्कृति’
नियम- जब भी सरकार दो विभागों को अलग करती है तब बंटवारे का सेटअप बनाता है। उसके बाद विभाग अलग होते हैं।
हुआ ये- शासन ने दोनों विभागों को घोषणा के साढ़े तीन साल तक अलग किया ही नहीं। संचालक एक ही रहे लेकिन उन्होंने मन से कर्मचारी बांट डाले।
नियम- बंटवारा नहीं हो जाता तब तक डीडीओ कोड (विभाग का खाता नंबर) अलग नहीं होता।
हुआ ये- बिना बंटवारा हुए ही राजभाषा के डीडीओ कोड को संस्कृति का बना दिया। पुरातत्व का कोड पुराना ही रहा।
नियम-राजभाषा में पैसे निकालने-जमा करवाने का अधिकार आयोग के सचिव को होता है।
हुआ ये- राजभाषा के डीडीओ कोड को संस्कृति के वरिष्ठ लेखा अधिकारी को सौंप दिया गया। जबकि सेटअप के बाद दोनों विभागों के लेखाधिकारी अलग होंगे।
शासन के आदेश पर ले गए थे विभाग
संस्कृति और पुरातत्व विभाग अभी अलग नहीं हुआ है, आप 4 साल पहले ही उसे अलग करके नवा रायपुर ले गए? – मैंने शासन के आदेश पर किया था। तत्कालीन मंत्री अमरजीत भगत ने खुद जाकर बिल्डिंग का निरीक्षण किया था।
विभागों के बंटवारे के लिए तो अब शासन ने समिति बनाई है, तब आपने कैसे अलग कर दिया? – मैं कैसे अलग कर सकता हूं। दोनों विभागों के बंटवारे के प्रस्ताव शासन को भेजे थे। उसके बाद ही संस्कृति के जो कर्मचारी हैं, उन्हें ही अलग लेकर गया।
अभी पांच लाख रुपए हर महीने अतिरिक्त खर्च हो रहा है? -वित्त से अनुमति लेने के बाद ही राजभाषा बिल्डिंग में किराए से शिफ्ट हुए।
अभी संस्कृति और पुरातत्व में कर्मचारियों को बंटवारा ही नहीं हुआ है। मैंने सचिव को पत्र लिखा है नवा रायपुर से संस्कृति विभाग को वापस लाया जाए। यह फिजूलखर्ची है, जो वहां किराया दिया जा रहा है। -राजेश अग्रवाल, मंत्री, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग संस्कृति और पुरातत्व विभाग का सेटअप अभी तैयार हो रहा है। इसके लिए शासन से पत्र आया है। सेटअप तय होने के बाद ही दोनों विभागों को अलग किया जाएगा। अभी दोनों एक ही हैं। -संजय कन्नौजे, संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्व



