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नामांकन विवाद : हाईकोर्ट ने विधायक यादव की अंतरिम अर्जी याचिका को किया खारिज

 

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बिलासपुर। भिलाई नगर से कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय की ओर से दायर चुनाव याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने देवेंद्र यादव की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने चुनाव याचिका के दो मुद्दों को प्रारंभिक मुद्दा मानकर पहले तय करने और बिना साक्ष्य दर्ज किए पूरी याचिका का निपटारा करने का आग्रह किया था। चुनाव याचिका की अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी।

बताया जाता है कि भिलाई नगर विधानसभा चुनाव में देवेंद्र यादव की जीत को पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडे ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की विभिन्न धाराओं के तहत दायर चुनाव याचिका में चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नामांकन के दौरान दाखिल शपथपत्र में सोशल मीडिया खातों, आय, संपत्ति और लंबित आपराधिक मामलों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई गईं। दोनों पक्षों की दलीलों के बाद हाईकोर्ट ने 21 अगस्त 2024 को मामले में पांच मुद्दे तय किए थे।

उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय भी देवेंद्र यादव की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर चुका है और उन्हें हाईकोर्ट में चुनाव याचिका का सामना करने का निर्देश दिया था। देवेंद्र यादव की ओर से अधिवक्ता बी.पी. शर्मा, मनय नाथ ठाकुर और पुष्प गुप्ता ने अंतरिम आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 14 नियम 2 तथा धारा 151 का हवाला देते हुए आग्रह किया गया कि मुद्दा क्रमांक 2 और 4 को प्रारंभिक मुद्दा मानकर पहले तय किया जाए। उनका कहना था कि प्रत्याशी ने शपथपत्र में सभी आवश्यक जानकारियां दी हैं, इसलिए इन मुद्दों का निर्णय कर बिना साक्ष्य दर्ज किए चुनाव याचिका का निपटारा किया जा सकता है

प्रेम प्रकाश पांडे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एन. के. शुक्ला और अधिवक्ता देवाशीष तिवारी ने दलील दी कि दोनों मुद्दे विवादित तथ्यों से जुड़े हैं। जवाब में सभी महत्वपूर्ण आरोपों का खंडन किया गया है, इसलिए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य के बिना इनका फैसला संभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मामला न तो न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है और न ही किसी वैधानिक प्रतिबंध का, इसलिए इसे प्रारंभिक मुद्दे के रूप में नहीं सुना जा सकता।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रारंभिक मुद्दों पर अलग से निर्णय केवल उन्हीं मामलों में दिया जा सकता है, जहां शुद्ध विधिक प्रश्न हो या तथ्य निर्विवाद हों। लेकिन जहां विवादित तथ्यों की जांच और मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण आवश्यक हो, वहां नियमित सुनवाई अनिवार्य होती है। अदालत ने कहा कि प्रत्याशी द्वारा जानकारी छिपाने, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन होने, चुनावी भ्रष्ट आचरण या अन्य अनियमितता तथा उसके चुनाव परिणाम पर प्रभाव जैसे प्रश्नों का उत्तर केवल साक्ष्यों के आधार पर ही दिया जा सकता है।

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