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मौसम-तापमान के हिसाब से फसल चुनकर की खेती, कमाई दोगुनी‎:टमाटर के साथ मक्का लगाया, फसल गर्मी से बची और पैदावार भी बढ़ी

 

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कबीरधाम जिले के खैरझिटी निवासी किसान ललित साहू खेती में नवाचार और वैज्ञानिक सोच के बल पर अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। बिरकोना में 12वीं तक पढ़ाई करने वाले ललित ने पारंपरिक खेती की सीमाओं को समझते हुए फसल चयन और खेती की पद्धति में बदलाव किया।

इसका परिणाम यह हुआ कि जहां पहले धान और चना की खेती से सीमित आय होती थी, वहीं अब सब्जियों और मिश्रित खेती के जरिए वे दोगुनी से अधिक कमाई कर रहे हैं।

ललित वर्तमान में अपनी भूमि के साथ-साथ एक और तीन एकड़ भूमि लीज पर लेकर खेती कर रहे हैं। वे प्याज, टमाटर, बैंगन, चना, गन्ना सहित विभिन्न फसलों का उत्पादन करते हैं। पिछले सात वर्षों से वे विशेष रूप से सब्जी खेती पर ध्यान दे रहे हैं।

उनका मानना है कि किसान मौसम, बाजार और नई तकनीकों को समझकर खेती करें। कम भूमि में भी बेहतर उत्पादन हो सकता है। अधिक आय भी प्राप्त हो सकती है। उनका नवाचार आज क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है।

भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान से टमाटर की फसल को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए ललित ने अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने टमाटर के साथ मक्का की खेती की। एक एकड़ क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाई। मक्का और टमाटर को साथ लगाया। ललित बताते हैं कि मक्का के पौधे प्राकृतिक आवरण का काम करते हैं।

इससे खेत का तापमान नियंत्रित रहता है। तेज धूप और गर्म हवाओं का सीधा असर टमाटर पर नहीं पड़ता। फसल झुलसने से बच जाती है। नुकसान न होने से पैदावार भी बढ़ी। यह तकनीक उन्होंने यूट्यूब के माध्यम से सीखी। इसे सफलतापूर्वक अपनाया। इसका सकारात्मक परिणाम उत्पादन में भी देखने को मिला।

ललित मिश्रित खेती को लाभदायक मानते हैं। उन्होंने गन्ने के साथ प्याज की खेती का सफल प्रयोग किया है। सामान्य रूप से गन्ने की कतारें ढाई से तीन फीट की दूरी पर लगाई जाती हैं, लेकिन मिश्रित खेती में वे चार फीट की दूरी रखते हैं। बीच में प्याज लगाते हैं। उन्होंने बताया कि गन्ने से एक साल में लगभग एक लाख रुपये की आय होती है।

प्याज की फसल छह महीने में ही एक लाख रुपये तक की कमाई दे सकती है। गन्ना तैयार होने तक प्याज की फसल निकल जाती है। इससे अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। साथ ही सिंचाई के पानी का भी बेहतर उपयोग हो जाता है।

ललित खेती में जैविक और रासायनिक, दोनों प्रकार के खादों का उपयोग करते हैं। वे जैविक खेती को अधिक महत्व देते हैं। फसलों में पत्ती-चूसक कीटों के नियंत्रण के लिए वे नीम ऑयल का प्रयोग करते हैं। इससे रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम होती है। फसल की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है।

ललित ने बताया कि सफलता का सबसे बड़ा आधार मौसम और बाजार की मांग के अनुसार खेती करना है। वे हर दो वर्ष में फसल चक्र बदलते हैं। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। रोग-कीटों का प्रकोप भी कम होता है। बारिश के मौसम में धनिया जैसी अधिक मांग वाली फसलों की खेती कर वे बाजार का लाभ उठाते हैं।

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