सरकार के सलाहकार बोले- E20 ईंधन से गाड़ियों को नुकसान:E10 पेट्रोल फिर शुरू हो; फ्यूल में 30% एथेनॉल मिलाया तो खाद्य संकट संभव

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन (CEA) का कहना है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों में नुकसान हो रहा है। पुराने टू-व्हीलर्स के लिए E10 पेट्रोल की बिक्री फिर से शुरू की जानी चाहिए। नागेश्वरन ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे अपने आर्टिकल में कहा कि भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य समय से पहले हासिल करके कच्चे तेल के आयात पर होने वाले अरबों रुपए तो बचा लिए, लेकिन अब एक नया संकट खड़ा हो रहा है। एथेनॉल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए गन्ना, मक्का और चावल जैसी खाद्य फसलों को बड़े पैमाने पर एथेनॉल फैक्ट्रियों में भेजा जा रहा है। मक्के का मुख्य इस्तेमाल पोल्ट्री और पशुओं के चारे में होता है। अगर एथेनॉल बनाने वाली कंपनियां ज्यादा दाम देकर मक्का खरीदने लगेंगी, तो पोल्ट्री और डेयरी इंडस्ट्री के लिए चारा महंगा हो जाएगा। नतीजा यह होगा कि अंडे, चिकन और दूध के दाम बढ़ेंगे, जिससे सीधे तौर पर खाद्य महंगाई को बढ़ावा मिलेगा।

नागेश्वरन बोले- 8 करोड़ गाड़ियों को E20 पेट्रोल से खतरा
वी अनंत नागेश्वरन के मुताबिक देश में इस समय करीब 8 करोड़ पुराने बाइक-स्कूटर दौड़ रहे हैं। ये पुरानी ‘कार्बोरेटर’ तकनीक पर चलते हैं, जो BS-IV इंजन नियमों के आने से पहले बनती थीं।
- समस्या क्या है: सरकार अब पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाकर बेच रही है। लेकिन पुराने कार्बोरेटर वाली गाड़ियां इस E20 पेट्रोल पर ठीक से चल नहीं पातीं।
- इंजन का गर्म होना: एथेनॉल में ऑक्सीजन ज्यादा होती है। पुरानी गाड़ियां हवा और पेट्रोल के इस नए मिक्स को अपने आप एडजस्ट नहीं कर पातीं, जिससे इंजन जल्दी और ज्यादा गर्म होने लगता है।
- पार्ट्स खराब होना: E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ियों के अंदर लगे रबर के पाइप और पार्ट्स धीरे-धीरे गलने या खराब होने का खतरा रहता है।
- सलाह क्या दी गई है: मुख्य आर्थिक सलाहकार का कहना है कि जब तक इन 8 करोड़ पुरानी गाड़ियों में मॉडिफिकेशन नहीं कर लिया जाता, तब तक पेट्रोल पंपों पर पुराने E10 पेट्रोल की बिक्री भी जारी रखनी चाहिए। इससे पुरानी गाड़ियां खराब होने से बच सकेगी।
एथेनॉल से चीनी और पानी का संकट
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का असर अब रसोई के बजट और पानी पर भी दिखने लगा है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस सीजन में देश के कुल सालाना उत्पादन की करीब 10% (लगभग 30 लाख टन) चीनी को एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल कर लिया गया। इसी वजह से अब सरकार आने वाले सीजन में एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल पर रोक लगाने की सोच रही है, ताकि देश में चीनी की कमी न हो और इसके दाम बेकाबू न हों। इसके साथ ही, एथेनॉल बनाने के चक्कर में देश का जलस्तर भी तेजी से गिर रहा है। गन्ना एक ऐसी फसल है जिसे उगाने में बहुत भारी मात्रा में पानी लगता है। मुख्य आर्थिक सलाहकार का कहना है कि हमें सिर्फ एथेनॉल फैक्ट्रियों में लगने वाले पानी को ही नहीं देखना चाहिए, बल्कि उस गन्ने को उगाने में जो अरबों लीटर भूजल खर्च हो रहा है, उसका हिसाब लगाना भी बेहद जरूरी है। जिस पानी से अन्य जरूरतें पूरी हो सकती थीं, वह गाड़ियों का ईंधन बनाने में बह रहा है।
सरकार बोली- E20 सुरक्षित, अलग पेट्रोल विकल्प देना आसान नहीं
दूसरी तरफ, सरकार ने एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम का लगातार बचाव किया है। सरकार का तर्क है कि E20 से विदेशी मुद्रा की भारी बचत हो रही है और किसानों को फसल की बेहतर कीमत मिल रही है। सरकारी टेस्टिंग के आधार पर यह भी कहा गया है कि E20 से वाहनों के इंजन को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचने के प्रमाण नहीं मिले हैं। साथ ही, सरकार ने देश भर में अलग-अलग तरह के पेट्रोल (E10 और E20) के विकल्प एक साथ उपलब्ध कराने की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इससे लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन का खर्च काफी बढ़ जाएगा।
आगे का रास्ता: E20 पर टिके रहें, जल्दबाजी में बदलाव से बचें
CEA नागेश्वरन यह नहीं कह रहे कि एथेनॉल योजना को बंद किया जाए, बल्कि 20% के बाद सतर्कता बरती जाए। ऊर्जा सुरक्षा से होने वाले फायदों की तुलना उन अनदेखे नुकसानों से की जानी चाहिए, जो कृषि क्षेत्र और खाद्य अर्थव्यवस्था को सहने पड़ सकते हैं।यह बहस केवल माइलेज या इंजन की उम्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि भारत ईंधन उत्पादन के लिए अपनी कितनी जमीन और पानी समर्पित करने को तैयार है।



