बैलाडीला की पहाड़ियों में मिला ‘जंगली अरहर’ का दुर्लभ खजाना; छत्तीसगढ़ धान और बस्तर जैव विविधता का वैश्विक हॉटस्पॉट बना

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छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग एक बार फिर अपनी असाधारण जैव विविधता को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। दंतेवाड़ा जिले की बैलाडीला पहाड़ियों में हुए विस्तृत जैव विविधता सर्वेक्षण में वैज्ञानिकों ने जंगली अरहर की दुर्लभ प्रजाति कजानस कजानिफोलियस की महत्वपूर्ण प्राकृतिक आबादी दर्ज की है। विशेषज्ञ इसे खेती में उपयोग होने वाली अरहर की मूल ‘जंगली पूर्व’ प्रजाति मानते हैं, जिसमें भविष्य की जलवायु चुनौतियों से मुकाबला करने की क्षमता छिपी हुई है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रजाति में रोग प्रतिरोधक क्षमता, अत्यधिक गर्मी सहन करने की ताकत और उच्च प्रोटीन जैसे दुर्लभ आनुवंशिक गुण मौजूद हैं। यही वजह है कि इसे भविष्य की खाद्य सुरक्षा, जलवायु अनुकूल खेती और कृषि अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जिस दौर में जलवायु परिवर्तन खेती और पारंपरिक फसलों के लिए सबसे बड़ा संकट बन रहा है, ऐसे समय में जंगली फसली रिश्तेदार नई और मजबूत फसल किस्में विकसित करने की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभर रहे हैं। यह सर्वेक्षण इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेस की संयुक्त वैज्ञानिक टीम ने किया।
टीम में आईजीकेवी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा और डॉ. मयूरी साहू के साथ एनबीपीजीआर के वैज्ञानिक डॉ. कैलाश चंद्र भट्ट और डॉ. पंकज कुमार कन्नौजिया शामिल थे। उल्लेखनीय है कि इसी टीम ने पहली बार इस दुर्लभ जंगली प्रजाति की पहचान और वैज्ञानिक रिपोर्टिंग की थी।
‘धान का कटोरा’ ही नहीं, जैव विविधता का भी सबसे बड़ा भंडार बैलाडीला में मिली इस दुर्लभ प्रजाति ने एक बार फिर यह साबित किया है कि छत्तीसगढ़ केवल ‘धान का कटोरा’ नहीं, बल्कि कृषि जैव विविधता का विशाल जीन बैंक भी है। राज्य में धान की 23 हजार 250 से अधिक पारंपरिक किस्में संरक्षित हैं, जो एशिया के सबसे बड़े संग्रहों में शामिल हैं। वहीं भारत सरकार के ‘पौध किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण’ द्वारा राज्य की 600 से अधिक कृषक प्रजातियों का पंजीकरण किया जा चुका है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बस्तर क्षेत्र कृषि जैव विविधता का ‘हॉटस्पॉट’ है, जहां कोदो-कुटकी, जंगली फल, सूखा-रोधी फसलें और पारंपरिक धान किस्मों का विशाल आनुवंशिक भंडार मौजूद है। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा के दौर में छत्तीसगढ़ की देशी प्रजातियां वैज्ञानिकों और कृषि अनुसंधान संस्थानों के लिए नई उम्मीद बनती जा रही हैं।
प्रदेश की चर्चित देशी धान प्रजातियां जशपुर : ढांड रस, हनुमान भोग, अगिया साल, बाथरस, जवा फूल, कलम लुचई, बरहा साल, लक्ष्मी भोग, धमतरी: नगरी दूबराज, कबीर भोग, भाटा महसूरी, राम भोग, बयाओ, बस्तर: लोकति माची, डबर धान, चिराई नक्की, गुदमा धान, अलसाकर, सफरी, बादशाह भोग, जांजगीर-चांपा: चपटी, गुर मटीया, राम जीरा, सरगुजा: जीरा फूल, बिसनी, कोरिया: करहनी धान, सन चूरिया, महासमुंद: कुबरी मोहर, पीहू धान, झिल्ली, दुर्ग : तिल कस्तूरी, बिलासपुर: विष्णु भोग।
भविष्य की नई फसलें विकसित करने में मिलेगी मदद
सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि बैलाडीला की पहाड़ियों में मौजूद जंगली अरहर की प्रजाति में छोटी फलियां, राख जैसे रंग वाले स्ट्रोफिओल्स और गहरे काले बीज जैसी विशेषताएं हैं। यही आनुवंशिक विविधता भविष्य में ऐसी नई फसल किस्में विकसित करने में मदद कर सकती है, जो सूखा, गर्मी और बीमारियों के प्रति अधिक मजबूत हों। अध्ययन के दौरान बैलाडीला क्षेत्र में औषधीय पौधों, दुर्लभ वनस्पतियों, वन्यजीवों और जंगली फसली रिश्तेदारों की उल्लेखनीय उपस्थिति भी दर्ज की गई। सर्वेक्षण में एनएमडीसी के बचेली कॉम्प्लेक्स के पर्यावरण विभाग ने भी सहयोग किया।
विरासत स्थल घोषित किया जाए
बैलाडीला क्षेत्र में लगातार बढ़ती खनन गतिविधियां इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं। इसी कारण बैलाडीला, किरंदुल और बचेली के पहाड़ी क्षेत्रों को ‘जैव विविधता विरासत स्थल’ घोषित किया जाए ताकि इस दुर्लभ प्रजाति को सरंक्षित किया जा सके।



