बंगाल चुनाव 2026: चुनावी सौगातें बनाम वित्तीय संकट

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कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘लोक-लुभावन’ घोषणाओं और राजकोषीय प्रबंधन के बीच का संघर्ष एक नए चरम पर पहुँच गया है. इतिहास में कभी निरंकुश शासकों की मर्जी ही कानून होती थी, जहाँ राजा अपने दीवान-ए-अशरफ को किसी को भी धन बांटने का आदेश दे सकते थे. लेकिन आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की शक्तियां संविधान और विधायी जवाबदेही से बंधी होती हैं.

वर्तमान में पश्चिम बंगाल में जिस तरह से ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘युवा साथी’ जैसी योजनाओं के लिए भारी-भरकम फंड की घोषणाएं की जा रही हैं, उसने संवैधानिक मर्यादा और बजटीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. संविधान के अनुच्छेद 205 और 206 के तहत आकस्मिक निधि (Contingency Fund) से किया गया खर्च भी विधानसभा के अनुमोदन के अधीन होता है, लेकिन चुनावी वर्ष में इन नियमों की अनदेखी एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है.
चुनावों से ठीक पहले कल्याणकारी योजनाओं का कार्ड खेलना भारतीय राजनीति का नया ‘सफल’ फॉर्मूला बन चुका है. असम की ‘अरणोदय’, मध्य प्रदेश की ‘लाड़ली बहना’, महाराष्ट्र की ‘माझी लाडकी बहिन’ और झारखंड की ‘मइया सम्मान’ जैसी योजनाओं ने सत्ताधारी दलों को सत्ता विरोधी लहर यानी ‘एंटी-इंकंबेंसी’ को ‘प्रो-इंकंबेंसी’ में बदलने में मदद की है.
आंकड़ों के आधार पर देखें तो इन राज्यों में सत्ताधारी दलों की सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. इसी पदचिह्न पर चलते हुए पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार ने 2021 के चुनाव से पहले ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना शुरू की थी, जिसका लाभ उसे चुनावी नतीजों में मिला.
अब 2026 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए राज्य सरकार ने इस योजना का दायरा और वित्तीय सहायता दोनों बढ़ा दी है. उपभोक्ता संख्या 2.21 करोड़ से बढ़ाकर 2.42 करोड़ करने और प्रति माह 500 रुपये की अतिरिक्त वृद्धि के कारण 15,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. आश्चर्य की बात यह है कि चालू वित्त वर्ष के लिए आवश्यक 2,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त फंड का बजट में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है.
इससे भी अधिक चौंकाने वाला मामला ‘युवा साथी’ योजना का है. मूल रूप से 15 अगस्त 2026 से शुरू होने वाली इस योजना को मुख्यमंत्री ने अचानक 1 अप्रैल से ही लागू करने का निर्णय लिया. बजट में इसके लिए 5,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन 80 लाख आवेदकों की संख्या को देखते हुए इसका वार्षिक खर्च 14,400 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है.
बजट आवंटन और वास्तविक खर्च के बीच का यह भारी अंतर सवाल उठाता है कि आखिर बिना विधायी मंजूरी के ‘कंसोलिडेटेड फंड’ से यह पैसा कैसे निकाला जाएगा? क्या विधायी पर्यवेक्षण और बजट की शुचिता केवल कागजों तक सीमित रह गई है? जब योजनाओं की लागत का सही आकलन नहीं किया जाता, तो राजकोषीय घाटा अनियंत्रित होना स्वाभाविक है.
वित्तीय संकट का एक और पहलू सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता (डीए) है. राज्य सरकार लंबे समय से वित्तीय तंगी का हवाला देकर इसे टालती रही, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इसे लागू करना पड़ा.
दिलचस्प यह है कि 15 मार्च 2026 को जिस दिन चुनाव आयोग ने दोपहर 4 बजे चुनाव तिथियों की घोषणा की, उससे महज कुछ ही मिनटों पहले मुख्यमंत्री ने मुअज्जिनों और पुजारियों के भत्ते में वृद्धि और सरकारी कर्मचारियों के बकाया डीए के भुगतान की घोषणा कर दी. यह टाइमिंग स्पष्ट करती है कि सरकार किसी भी कीमत पर चुनावी लाभ को प्राथमिकता दे रही है, चाहे इसके लिए राजकोषीय अनुशासन की बलि ही क्यों न देनी पड़े.
लंबी अवधि के विकास बनाम तत्काल लोक-लुभावनवाद की बहस पुरानी है, लेकिन प्रक्रियागत अनियमितता एक नया खतरा है. यदि सरकारें विधानसभा की पूर्व अनुमति के बिना बड़े वित्तीय दायित्वों को स्वीकार करती हैं, तो यह संसदीय लोकतंत्र के मूल ढांचे पर प्रहार है.
पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (PAC) और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की आपत्तियों की जिस तरह से अनदेखी की जा रही है, वह पश्चिम बंगाल जैसे कर्ज में डूबे राज्य के लिए भविष्य में बड़े आर्थिक संकट का संकेत है.
चुनावी जीत के लिए वित्तीय अनुशासन को ताक पर रखने की यह होड़ अंततः करदाताओं पर ही बोझ डालेगी. यदि हम चाहते हैं कि वित्तीय अनुशासनहीनता एक पूर्ण आर्थिक पतन में न बदले, तो हमें इन प्रक्रियागत खामियों और संवैधानिक उल्लंघन की ओर तुरंत ध्यान देना होगा. विकास का पहिया तभी घूम सकता है जब राजकोषीय नींव मजबूत और पारदर्शी हो.



