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बिलासपुर में मच्छरों का तांडव: 70 वार्ड बेहाल, फागिंग और लार्वा कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह फेल; डेंगू-मलेरिया का खतरा बढ़ा

 

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बिलासपुर: न्यायधानी बिलासपुर में इस साल मच्छरों का प्रकोप खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। हालात ऐसे हैं कि रात में सोना तो दूर, दिन में बैठना भी मुश्किल हो गया है। 70 वार्डों में एक जैसी स्थिति है, जहां फागिंग और लार्वा कंट्रोल ठप पड़े हैं। बीमारियां बढ़ रही हैं, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता ने समस्या को और गंभीर बना दिया है, जो चिंताजनक है।

बिलासपुर में मच्छरों का आतंक अब जनस्वास्थ्य संकट बन चुका है। शहर के लगभग सभी 70 वार्डों और निगम में शामिल ग्रामीण क्षेत्रों में एक जैसी स्थिति है। नाले-नालियों में जमा गंदा पानी मच्छरों के लिए स्थायी प्रजनन स्थल बन गया है। नगर निगम हर साल करीब दो करोड़ रुपये मच्छर नियंत्रण पर खर्च करने का दावा करता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।

इन इलाकों में स्थिति ज्यादा खराब

फागिंग मशीनों की संख्या सीमित है और जो हैं, उनमें से कई खराब पड़ी हैं। लार्वा कंट्रोल के नाम पर दवा छिड़काव की मानिटरिंग नहीं हो रही। नतीजा यह है कि बीते दो वर्षों में 574 मच्छर जनित बीमारियों के केस सामने आ चुके हैं, जिनमें डेंगू और मलेरिया प्रमुख हैं। शहर के हेमू नगर, शंकरनगर, तेलीपारा, तालापारा, सरकंडा, तोरवा, सिरगिट्टी जूना बिलासपुर जैसे इलाकों में स्थिति ज्यादा खराब है।

हॉस्टलों में रहने वाले छात्र रातभर मच्छर भगाने में लगे रहते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। खेल मैदानों और सार्वजनिक स्थलों पर भी मच्छरों का कब्जा है। जनप्रतिनिधियों के दावे और प्रशासनिक बयान कागजों तक सीमित हैं, जबकि आम जनता अपनी जेब से मच्छर भगाने के साधनों पर खर्च कर रही है। साफ है कि यदि तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और विकराल रूप ले सकता है।

हर गली में मच्छरों का कब्जा

शहर का शायद ही कोई इलाका बचा हो जहां मच्छरों का आतंक न हो। शाम होते ही हालात बदतर हो जाते हैं। घरों के अंदर तक मच्छर पहुंच रहे हैं। लोग दरवाजे-खिड़कियां बंद रखने को मजबूर हैं। पार्क, मैदान और सड़क किनारे खड़ा होना मुश्किल हो गया है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है।

सिस्टम फेल, योजनाएं बेअसर

नगर निगम की फागिंग मशीनें या तो कम हैं या खराब पड़ी हैं। लार्वा कंट्रोल की प्रक्रिया कागजों में सिमट गई है। करोड़ों का बजट खर्च होने के बावजूद कोई ठोस परिणाम नहीं दिख रहा। इससे साफ है कि सिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है।

बीमारियों का बढ़ता खतरा

मच्छरों के कारण डेंगू, मलेरिया और अन्य बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। बीते दो वर्षों में 574 केस दर्ज होना चिंता का विषय है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है। स्वास्थ्य विभाग सतर्कता की बात करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर रोकथाम के उपाय कमजोर हैं। यह स्थिति आने वाले समय में और गंभीर हो सकती है।

कॉलेज छात्र अधिक परेशान

हॉस्टलों में रहने वाले कालेज छात्र परीक्षा के समय मच्छरों से जूझ रहे हैं। रातभर नींद पूरी नहीं होने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है। दफ्तरों में भी कामकाजी लोग परेशान हैं। दिन में भी मच्छरों का हमला जारी रहता है। यह समस्या अब सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि उत्पादकता और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रही है।

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