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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बताया कि बस्तर माओवाद से लगभग मुक्त हो चुकाहजारों के आत्मसमर्पण और 150 से अधिक सुरक्षा कैंपों की स्थापना वाली त्रि-स्तरीय रणनीति से मिली।

 

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नई दिल्ली। माओवाद के खिलाफ लड़ाई पर बोलते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि बस्तर से माओवाद लगभग खत्म हो चुका है। यह त्रि-स्तरीय रणनीति के माध्यम से संभव हुआ। पहला, सुरक्षा एजेंसियों ने शीर्ष माओवादी हिंसकों को निशाने पर लिया। बसवराजू, कोसा, गुडसा उसेंडी, चलपती, हिड़मा जैसे बड़े नाम धाराशाई कर दिए गए।

दूसरा, लगातार दबाव के बीच हजारों माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। तीसरा, करीब 150 से अधिक नए सुरक्षा कैंप और फॉरवर्ड बेस स्थापित हुए। जिन इलाकों में कभी माओवादियों का वर्चस्व था, वहां अब सड़क, मोबाइल नेटवर्क, राशन, स्कूल और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचीं।

बस्तर के घने जंगलों में कभी बंदूक की नली ही सत्ता का प्रतीक थी। ताड़मेटला की जली हुई धरती, झीरम घाटी में छलनी पड़ी गाड़ियों और बिखरे शव। ये दृश्य सिर्फ घटनाएं नहीं थे, बल्कि उस भयावह दौर की पहचान थे, जब लोकतंत्र और जीवन दोनों एक साथ निशाने पर थे, लेकिन इसी बस्तर में कहानी बदली, जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने साफ संकल्प लिया कि माओवादी हिंसा को जड़ से खत्म करना है और वह भी तय समयसीमा के भीतर।

यह संकल्प केवल घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर उतरती रणनीति बना। वर्ष 2014 के बाद अभियान ने रफ्तार पकड़ी, लेकिन 2019 के बाद यह निर्णायक हुआ। शाह के लगातार बस्तर दौरे, समीक्षा बैठकों और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने सुरक्षाबलों को स्पष्ट संकेत दिया कि अब जवाब रक्षात्मक नहीं, आक्रामक होगा।

वर्ष 2021 की टेकुलगुड़ेम मुठभेड़, जिसमें 21 जवान बलिदान हुए, इस बदलाव की कीमत भी थी और दिशा भी। इसके बाद अंतरराज्यीय समन्वय के साथ चौतरफा दबाव की रणनीति तैयार हुई। इस पूरी लड़ाई में राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और गृहमंत्री विजय शर्मा की भूमिका भी अहम रही। सरकार ने सुरक्षा और विकास-दोनों मोर्चों पर संतुलित दबाव बनाए रखा, जिससे अभियान को स्थायित्व मिला।

खौफ के साए से बाहर निकला बस्तर

जहां कभी 3,400 से अधिक मुठभेड़ें, हजारों विस्फोट और 5,000 से ज्यादा मौतों का इतिहास था, वहीं अब हिंसा की घटनाएं तेजी से घटी हैं। अब झारखंड में मिसिर बेसरा जैसे कुछ नाम ही बचे हैं। बस्तर में बंदूक की आवाज अब लगभग खामोश है। जो कभी माओवादी हिंसा के नाम पर धधकती आग थी, वह अब राख में बदल चुकी है और यह बदलाव तय समय से पहले आया है।

पिछले 25 वर्षों में 1,800 से अधिक सुरक्षा बल के जवान बलिदान हुए। अब भी 40 हजार केंद्रीय सुरक्षाबल और 20 हजार स्थानीय बल इस धरती की सुरक्षा में दिन-रात डटे हैं। सीआरपीएफ, बीएसएफ, आइटीबीपी बलों के जवान अपने घरों से सैंकड़ों किमी दूर अपनी जान दांव पर लगा इस लाल आतंक के विरुद्ध खड़े हैं।

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