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कर्ज, फसल बर्बादी और सिस्टम के दावों के बीच ‘मिट्‌टी’ में दब गई एक ज़िंदगी; देखिए पड़ताल

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मध्यप्रदेश  को देश का अन्न भंडार कहा जाता है, लेकिन उसी प्रदेश में अन्न उगाने वाला किसान  आज खुद सवाल बनता जा रहा है. जिन हाथों से खेत लहलहाते हैं, उन्हीं हाथों की लकीरों में अब बेबसी, कर्ज और टूटे सपनों की कहानी लिखी जा रही है. विदिशा जिले से सामने आया एक और मामला इस कड़वे सच को फिर उजागर करता है. विदिशा में एक किसान की आत्महत्या के बाद सरकार ने इस खबर को भ्रामक बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया, लेकिन  की टीम उस किसान के खेत तक पहुंची और पूरे मामले को समझा. देखिए ये रिपोर्ट

फसल बर्बादी के बाद टूटा किसान का हौसला

विदिशा जिले के रीठा फाटक क्षेत्र में रहने वाले 30 वर्षीय किसान प्रशांत शर्मा ने अपने ही घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. प्रशांत चार बीघा जमीन पर खेती करता था उस पर करीब 50 हजार रुपये का कर्ज था, जिसे चुकाने की उम्मीद वह अपनी फसल से लगाए बैठा था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने उसकी साल भर की मेहनत को बर्बाद कर दिया. खेतों में खड़ी गेहूं की फसल खराब हो गई, जिससे प्रशांत मानसिक तनाव में आ गया. परिवार वालों के मुताबिक, वह लगातार चिंता में रहता था और कहता था कि अब कर्ज कैसे चुकाएगा.

रोते पिता का सवाल: मेरे बेटे का कसूर क्या था?

मृतक किसान के पिता धनीराम शर्मा के लिए यह सदमा असहनीय है. जिस बेटे को बुढ़ापे की लाठी बनना था, आज उसी बेटे की अर्थी उठानी पड़ी. धनीराम बताते हैं कि परिवार में कुल 12 सदस्य हैं, प्रशांत सबसे बड़ा बेटा था और दो मासूम बच्चियों का पिता भी. उनका कहना है कि ओलावृष्टि के बाद से ही प्रशांत बदला-बदला सा रहने लगा था. वह बार-बार फसल बर्बादी और कर्ज की बात करता था. परिवार को अंदाजा नहीं था कि वह अपनी परेशानियों का ऐसा खौफनाक रास्ता चुन लेगा.

भाई बोला: न कोई विवाद, न कोई पारिवारिक तनाव

मृतक के भाई सुरेंद्र शर्मा का कहना है कि प्रशांत बहुत सीधा-सादा इंसान था. न किसी से झगड़ा, न कोई पारिवारिक विवाद. घर में किसी तरह की कलह नहीं थी. आत्महत्या की वजह सिर्फ आर्थिक दबाव और फसल का नुकसान ही नजर आता है.

प्रशासन की दलील: फसल को नुकसान नहीं

जहां एक तरफ परिवार और ग्रामीण फसल बर्बादी को आत्महत्या की वजह बता रहे हैं, वहीं प्रशासन इससे इनकार करता है. प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि बारिश या ओलावृष्टि से खेतों में कोई खास नुकसान नहीं हुआ और आत्महत्या के पीछे अन्य कारण हो सकते हैं.

खेतों ने खोली दावों की पोल

जब  ने मौके पर जाकर खेतों की स्थिति देखी गई, तो जमीनी हकीकत प्रशासन के दावों से बिल्कुल अलग नजर आई. कई खेतों में गेहूं की फसल पीली पड़ चुकी थी, कहीं फसल पूरी तरह बर्बाद होकर कचरे में तब्दील हो गई थी. ग्रामीण किसानों ने खराब फसल दिखाते हुए बताया कि पूरे इलाके में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने भारी तबाही मचाई है.

बड़ा सवाल: कागजों में सुरक्षित, जमीन पर बर्बाद

यह मामला एक बार फिर उस खाई को उजागर करता है जो कागजी रिपोर्टों और जमीनी सच्चाई के बीच बढ़ती जा रही है. अगर फसल सुरक्षित थी, तो फिर खेतों में खड़ी बर्बादी क्या बयान कर रही है? और अगर फसल बर्बाद थी, तो किसान को समय पर राहत क्यों नहीं मिल

पीछे रह गईं ज़िंदगियाँ, आगे खड़े सवाल

एक किसान की मौत के साथ कहानी खत्म नहीं होती. पीछे रह जाते हैं बूढ़े मां-बाप, दो मासूम बच्चियां और एक ऐसा परिवार, जिसके सामने अब रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा है. वहीं खेत आज भी खामोश होकर इंसाफ की गवाही दे रहे हैं. यह सिर्फ एक किसान की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है जो हर बार जांच के नाम पर आंकड़े तो पेश करता है, लेकिन किसान की टूटती सांसों की आवाज़ नहीं सुन पाता.

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