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आस्था का विभाजन : बस्तर में देवगुड़ी-चर्च आमने-सामने

 

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बस्तर की सुबहें अब पहले जैसी शांत नहीं रह गई हैं। जंगल की नमी, महुए की गंध और मिट्टी की खुशबू के बीच एक अनदेखा तनाव व्याप्त है। यह तनाव विचारों का है, जहां आस्था के दो रास्तों के बीच खींची गई एक महीन लेकिन गहरी रेखा ने बस्तर के गांवों को दो भागों में बांट दिया है।

नारायणपुर के बड़ेडोंगर से बाघनपाल तक गांवों की पगडंडियां अब केवल खेतों और जंगलों तक नहीं जातीं, बल्कि बहस के उन मोड़ों तक पहुंचती हैं, जहां लोग अपनी-अपनी सच्चाई लेकर खड़े हैं। तोकापाल विकासखंड के बाघनपाल चौक पर चर्च का रास्ता पूछने पर पहले खामोशी मिली। कुछ आंखें मेरी ओर उठीं, जैसे सवाल कर रही हों। परिचय देने पर तनाव की रेखा ढीली पड़ गई।

अब वे लोग अलग हो गए

उंगलियों ने चर्च का रास्ता दिखाया, जो गांव के बीच स्थित था, लेकिन उसके चारों ओर एक अदृश्य दीवार खड़ी थी। एक स्थानीय निवासी ने बताया कि अब वे लोग अलग हो गए हैं। न वो हमारे त्योहार में आते हैं, न हम उनके। बाघनपाल के चर्च के पास राजूलाल ने बताया कि वह माडि़या आदिवासी समुदाय से हैं और अब मतांतरित हो चुके हैं। गांव वाले अब उनसे बात नहीं करते और मरने पर जमीन भी नहीं देना चाहते। धर्म स्वातं‌र्त्य विधेयक के आने के बाद घर वापसी का दबाव बढ़ता दिख रहा है।

वैचारिक स्तर पर दो हिस्सों में बंट गया है गांव

बाघनपाल का चर्च केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह गांव के बदलते रिश्तों का प्रतीक बन गया है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यही चौक सामूहिक फैसलों का केंद्र था, लेकिन अब गांव दो हिस्सों में बंटता दिखता है। हाल ही में बेंगलुरु एयरपोर्ट पर प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई ने इस बहस को और धार दी।

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