छत्तीसगढ़प्रमुख खबरें

राजस्व निरीक्षक प्रशिक्षण विभागीय परीक्षा 2024 में चयनित अभ्यर्थियों के साथ अन्याय

 

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

रायपुर। राजस्व निरीक्षक प्रशिक्षण विभागीय परीक्षा 2024 — न्यायालय की क्लीन चिट के बावजूद शासन का टालमटोल रवैया चयनित अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ अन्याय
राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा आयोजित राजस्व निरीक्षक विभागीय परीक्षा 2024 दिनांक 07 जनवरी 2024 को रायपुर के 6 परीक्षा केंद्रों में सफलतापूर्वक आयोजित की गई थी। परीक्षा में समस्त नियमों का पालन करते हुए OMR पद्धति से उत्तर पुस्तिकाओं की जांच की गई। मॉडल उत्तर 16 जनवरी 2024 को तथा परीक्षा परिणाम 29 फरवरी 2024 को जारी किया गया।
❖ परीक्षा उपरांत उत्पन्न हुआ विवाद:
परीक्षा परिणाम आने के पश्चात राजस्व पटवारी संघ द्वारा यह आरोप लगाया गया कि कुछ चयनित अभ्यर्थी आपस में पारिवारिक रिश्तेदार हैं। इसी आधार पर दिनांक 11 मार्च 2024 को माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर में WPS 1832/2024 दायर की गई, जिसमें परीक्षा को निरस्त करने की मांग की गई थी।
❖ माननीय न्यायालय द्वारा परीक्षा को वैध ठहराया गया:
दिनांक 16 अप्रैल 2024 को उच्च न्यायालय बिलासपुर ने स्पष्ट रूप से इस याचिका को खारिज करते हुए यह कहा कि परीक्षा का संचालन नियमानुसार हुआ है और परीक्षा में सम्मिलित होने के बाद उसकी प्रक्रिया पर आपत्ति नहीं की जा सकती। यह निर्णय Anupal Singh बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के सर्वोच्च न्यायालयीय निर्णय के अनुरूप दिया गया था।
❖ शासन की उच्च स्तरीय जांच और उसकी खामियां:
इसके बावजूद शासन ने 23 अगस्त 2024 को एक 5-सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की। समिति द्वारा 3 महीनों के भीतर कोई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई, जिससे व्यथित होकर 4 चयनित अभ्यर्थियों ने WPS 7889/2024 याचिका प्रस्तुत की। इसके बाद हड़बड़ी में 29 नवम्बर 2024 को केडी कुंजाम समिति द्वारा प्रतिवेदन तैयार किया गया जिसमें कई तथ्यात्मक त्रुटियाँ पाई गईं:
• चयनित अभ्यर्थियों के बयान लिए बिना ही निष्कर्ष निकाला गया।
• बैठक व्यवस्था, अनुक्रमांक आवंटन व रेंडमाइजेशन प्रक्रिया की गहन जांच नहीं की गई।
• 22 अभ्यर्थियों को पारिवारिक रिश्तेदार बताने के लिए RTI से प्राप्त नामों का भी सही परीक्षण नहीं किया गया।
• शिकायतकर्ताओं द्वारा कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए थे, यह स्वयं समिति ने स्वीकारा।
फिर भी समिति ने अपने अंतिम निष्कर्ष में बिना पर्याप्त साक्ष्य यह दर्शाने का प्रयास किया कि परीक्षा में कुछ त्रुटियाँ थीं, जिससे शासन को गुमराह कर चयनित अभ्यर्थियों का प्रशिक्षण रोक दिया गया।
❖ माननीय उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी:
• WPS 7889/2024 में दिनांक 14 जनवरी 2025 को उच्च न्यायालय ने शासन को 15 दिनों के भीतर चयनित अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण भेजने का आदेश दिया।
• शासन द्वारा न्यायालय को यह जानकारी दी गई कि प्रशिक्षण प्रारंभ किया जाएगा, परंतु फिर भी प्रशिक्षण रोक दिया गया।
• WPS 846/2025, WPS 1205/2025 और 1206/2025 जैसी याचिकाओं में भी यही क्रम चला।
❖ शासन का असंगत रवैया:
जब न्यायालय ने बार-बार आदेश दिए और कोई ठोस आधार नहीं मिलने पर प्रशिक्षण प्रारंभ करने की बात कही, तब शासन ने एक नई जांच EOW/ACB से कराने का आदेश दिनांक 04 मार्च 2025 को जारी कर दिया, जिसकी कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है।
शासन की यह नीति स्पष्ट करती है कि वह न्यायालय के आदेशों को नजरंदाज़ करते हुए केवल कुछ संगठनों के दबाव में निर्णय ले रही है। इस प्रकार से योग्य व पारदर्शी परीक्षा से चयनित अभ्यर्थियों को महीनों से मानसिक तनाव, सामाजिक अपमान और भविष्य की अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।

🔷 हम चयनित अभ्यर्थीगण मीडिया से यह अपेक्षा करते हैं कि:
1. इस प्रकरण को न्यायिक दृष्टिकोण और तथ्यों के आधार पर आमजन और शासन तक पहुँचाएं।
2. न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बाद भी प्रशिक्षण नहीं देना शासन की प्रशासनिक विफलता है, इसे उजागर करें।
3. शासन को यह स्मरण कराएं कि किसी पारदर्शी परीक्षा को राजनीति, संगठन या मीडिया ट्रायल के दबाव में आकर रद्द नहीं किया जाना चाहिए।

Related Articles

Back to top button