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विकास के पहिए के नीचे कुचला गया मजदूर वर्ग — अब चाहिए ज़मीन पर औद्योगिक सुरक्षा

प्रदुमन शर्मा, प्रदेश महासचिव, अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग की कलम से- नमश्कार, जय हिंद।

 

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रायपुर, छत्तीसगढ़ | उम्मीद है कि समाज का हर वर्ग सुखी होगा, लेकिन एक वर्ग ऐसा है जो आज भी अपने पसीने, मेहनत और जान की कीमत पर देश के विकास की नींव मजबूत कर रहा है — और वही सबसे अधिक पीड़ा में है। वह वर्ग है हमारा मेहनतकश मजदूर वर्ग, जो औद्योगिक संस्थानों, निर्माण कार्यों और अन्य श्रम क्षेत्रों में कार्यरत है।
वह दिन-रात बिना कमी के मेहनत करता है, फिर भी दुख उसका साथी बना हुआ है। हर औद्योगिक हादसे में सबसे पहले वही घायल होता है, वही अपाहिज होता है, और कई बार अपनी जान भी गँवा बैठता है। हादसे के बाद उसके परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है — और जो मालिक उसकी मेहनत से समृद्ध हुआ, वही मुआवजे के लिए भी उसे संघर्ष करने पर मजबूर करता है।
यह मुआवजा कोई एहसान नहीं, बल्कि उसी मजदूर का बीमा, पसीना और खून-पसीने से अर्जित अधिकार है।
फिर भी कई उद्योगपति इस अधिकार को “अपनी दया” बताकर देते हैं।
मैं इस अवसर पर औद्योगिक सुरक्षा विभाग का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ — जो उद्योगों द्वारा जमा की जाने वाली सुरक्षा रिपोर्टों को अक्सर एसी कमरों से ही स्वीकृत कर देता है, बिना यह सुनिश्चित किए कि ज़मीन पर वास्तव में मजदूर सुरक्षा उपाय लागू हैं या नहीं। अगर प्रतिवेदन के बजाय वास्तविक निरीक्षण किए जाएँ, तो शायद ये हादसे घटकर नगण्य हो जाएँ।
आज हम डिजिटल युग में हैं, लेकिन रायपुर जैसे शहर में भी प्रतिदिन दो से चार फैक्ट्रियों से मजदूरों के हताहत होने की खबरें आती हैं। सुबह अख़बारों में किसी मजदूर की मृत्यु की खबर छपती है, और उसी के परिवार की संघर्ष गाथा मुआवज़े के लिए शुरू हो जाती है।
जो अपने पसीने से देश बनाता है, वही हादसों में भुला दिया जाता है।
कारखानों की मशीनें चलती रहती हैं, मगर रुक जाता है एक मजदूर का जीवन।
मैं औद्योगिक सुरक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों से विनम्र अपील करता हूँ कि –
“सिर्फ रिपोर्टों में नहीं, ज़मीन पर चाहिए औद्योगिक सुरक्षा।”
यदि आप केवल 10 प्रतिशत सख्ती से भी उद्योगों के साथ पेश आएँ, तो शायद वह दिन आए जब “रोज़ के हादसे” महीनों या सालों में एक बार सुनाई दें और तब यह पंक्ति बदल सके:
“औद्योगिक सुरक्षा विभाग की लापरवाही: हर हादसे की जड़ में सिस्टम की चुप्पी।”
अब वक्त है, सिस्टम की चुप्पी तोड़ने का।

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