आए थे रोजी-रोटी कमाने, खाने पर ही आ गया संकट, यूपी-बिहार-बंगाल के प्रवासी बोले- आ अब लौट चलें


\घर से हजारों किलोमीटर दूर प्रवासी रोजी-रोटी की जुगाड़ में निकले थे। अब एलपीजी किल्लत से उनके खाने पर ही संकट छा गया। इससे प्रवासी मजदूर अब बोल रहे, आ अब लौट चलें। इन दिनों भारी संख्या में प्रवासी अपने घर जाने के लिए दूसरे प्रदेशों समेत दिल्ली से रेलवे स्टेशनों पर पहुंच रहे हैं। इससे स्टेशनों पर भारी भीड़ देखी जा रही है।

रोजी-रोटी की तलाश में आए थे
एक किलो गैस के लिए देना पड़ रहा 600-800 रुपये
नहीं इतना पैसा कि रोज बाहर खाना खा सकें

दिहाड़ी से अधिक गैस की कीमत
बंगाल में चुनाव है, वहां तो दिक्कत नहीं होगी
दिल्ली में एलपीजी गैस संकट का सामना कर रहे पश्चिम बंगाल के लोगों में वापसी का दूसरी वजह भी देखी गई। उनका कहना था कि दिल्ली में खाने के लाले पड़ रहे हैं, लेकिन उनके गृह राज्य में चुनावी साल होने से तोहफों की भरमार है। सरकार वहां गैस की किल्लत नहीं होने दे रही है और खाने-पीने की सुविधा भी भरपूर है। पश्चिम बंगाल वापस जा रहे नदीम ने बताया कि वहां जाने से वोट तो देंगे ही, चुनावों के दौरान कोई संकट भी नहीं रहेगा।
किराए का बोझ और दो वक्त की रोटी की जंग जारी
आनंद विहार स्टेशन पर अपनी पोटली बांधे खड़े छोटे लाल की आंखों में बेबसी साफ देखी गई। वह बताते हैं कि साहब, काम बंद है, मालिक ने हाथ खड़े कर दिए हैं। मकान मालिक किराया मांग रहा है, लेकिन यहां तो पेट भरने के लाले पड़े हैं। जब गैस ही नहीं मिलेगी तो खाना कहां बनाएंगे। बताया कि कम से कम गांव में सूखी रोटी तो नसीब होगी।
पलायन शौक नहीं मजबूरी बनी
दिल्ली में रहकर अपना जीवन यापन करना अब गरीब मजदूर प्रवासियों के लिए मुश्किल हो गया है। मजदूरों का भरोसा अब व्यवस्था से उठ गया है। ऐसे में गरीब और मजदूर लोगों के लिए पलायन शौक नहीं मजबूरी बन चुकी है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशनों पर लंबी-लंबी लाइनें और अपनों के साथ सिसकते चेहरे यह बता रहे हैं कि महानगरों की चकाचौंध के पीछे का अंधेरा कितना गहरा है।
होटल-रेस्टोरेंट पर जड़े ताले, तो छिन गया रोजगार
एलपीजी संकट का सबसे अधिक असर होटल-रेस्टोरेंट पर पड़ा है। गैस की कमी के कारण छोटे-बड़े सैकड़ों होटल और रेस्टोरेंट बंद हो गए हैं। नतीजतन, वहां काम करने वाले वेटर, रसोइये और सफाई कर्मचारियों की छुट्टी कर दी गई है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल से आए इन प्रवासी मजदूरों पर दोहरी मार पड़ी है। एक तरफ चूल्हा जलाने के लिए गैस नहीं है, तो दूसरी तरफ कमाई का जरिया नहीं बचा।


