व्याकरण ही नहीं, सत्यता और संतुलन ही भाषा की वास्तविक शुचिता – कुलपति दयाल

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के एकमात्र कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य के युगद्रष्टा मुंशी प्रेमचंद की जयंती 31 जुलाई के अवसर पर एक ऐतिहासिक पहल की गई। इस पावन अवसर पर विश्वविद्यालय में बौद्धिक विमर्श इकाई की स्थापना की गई, जिसके तहत सार्वजनिक जीवन में भाषा की शुचिता विषय पर एक विशेष राष्ट्रीय विमर्श आयोजित हुआ।

आम आदमी की सहज-सरल बोली को साहित्य के उच्च शिखर पर स्थापित किया
इस अवसर पर कुलपति प्रो. डॉ. मनोज दयाल ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक एवं पत्रकारिता योगदान को नमन करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी धारदार लेखनी से समाज की विसंगतियों पर करारा प्रहार किया और आम आदमी की सहज-सरल बोली को साहित्य के उच्च शिखर पर स्थापित किया। आज के दौर में भाषा की शुचिता का दायरा केवल व्याकरणिक शुद्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सत्यता, वैचारिक संतुलन और वस्तुनिष्ठता का समाहित होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में संवाद का सकारात्मक प्रयोग समाज को जोड़ता है, जबकि मर्यादाहीन और कलुषित भाषा सामाजिक विभाजन को जन्म देती है।
डिजिटल युग में संवाद की मर्यादा सबसे बड़ी चुनौती
कुलसचिव सुनील शर्मा ने कहा कि सफल संवाद वही है जो श्रोता की समझ और गरिमा को ध्यान में रखकर किया जाए। सार्वजनिक जीवन में हमारी भाषा का स्तर ही हमारे व्यक्तित्व और विचारों का दर्पण होता है। विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्यों ने रेखांकित किया कि आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया की अति-सक्रियता के बीच भाषा की मर्यादा, संयम और संतुलन बनाए रखना पत्रकारिता और समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
नियमित रूप से होंगे समकालीन विषयों पर मंथन
विश्वविद्यालय में नवगठित बौद्धिक विमर्श इकाई के माध्यम से अब नियमित रूप से ज्वलंत व समकालीन विषयों पर परिचर्चाएँ आयोजित की जाएँगी, जिससे विद्यार्थियों और प्राध्यापकों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान की संस्कृति और मजबूत हो सके। इस अवसर पर डॉ. शैलेंद्र खंडेलवाल, डॉ. आशुतोष मंडावी, डॉ. नृपेंद्र शर्मा एवं डॉ. राजेंद्र मोहंती, पत्रकारिता विभागाध्यक्ष श्री पंकज नयन पांडेय उपस्थित थे।



