100 साल पूरे होने पर जारी किया गया RSS का गैजेट और तिरंगे की गैरमौजूदगी – सवाल उठना लाज़मी है

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मिहिर कुर्मी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना को 100 साल पूरे होने वाले हैं, और इस अवसर पर एक विशेष “गैजेट” या प्रतीक चिन्ह प्रस्तुत किया गया है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस डिज़ाइन में कहीं भी भारत का राष्ट्रध्वज तिरंगा नहीं दिखाई देता।
ये वही तिरंगा है जिसके लिए न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानियों ने जान दी। भगत सिंह, अशफाकउल्ला खान, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे वीरों ने जिस झंडे को अपना गर्व माना – आज जब देश एक सदी पुराने संगठन की ‘उपलब्धि’ देख रहा है, वहां से उस तिरंगे का गायब रहना एक साधारण चूक नहीं मानी जा सकती।
क्या यह सवाल पूछना गलत है कि इन तथाकथित राष्ट्रभक्तों को तिरंगे से परेशानी क्यों है?
क्या ‘राष्ट्रभक्ति’ केवल एक विचारधारा तक सीमित है?
क्या राष्ट्र का सम्मान तिरंगे से ऊपर रखा जा सकता है?
इतिहास गवाह है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहा था, तब संघ के संस्थापक हेडगेवार ने अपने कार्यकर्ताओं को संघर्ष से दूर रहने की हिदायत दी थी। संघ ने कभी तिरंगे को अपने मुख्यालय में फहराने को प्राथमिकता नहीं दी – और जब 2002 में तिरंगा फहराने की माँग हुई, तो नागपुर मुख्यालय में इसे रोकने के लिए अदालत तक चले गए थे।
तो फिर यह सवाल करना बिल्कुल जायज़ है कि –
जो संगठन 100 साल बाद भी तिरंगे को स्वीकार नहीं कर सका, क्या वो वास्तव में भारत की आत्मा को समझता है?
आज जब हर सरकारी संस्थान, हर नागरिक, हर स्कूल और कॉलेज गर्व से तिरंगा लहराता है, तब RSS जैसे संगठन का इससे कतराना केवल विचारधारा नहीं, बल्कि नीयत पर भी सवाल खड़े करता है।
देश किसी एक विचारधारा से नहीं, तिरंगे की छाया में खड़े हर भारतीय से बनता है। और अगर किसी को तिरंगे से ही परहेज़ है, तो राष्ट्रभक्ति के उनके दावों को जनता जरूर कटघरे में खड़ा करेगी।



