Uncategorizedछत्तीसगढ़प्रमुख खबरें

जहां बोलती थीं बंदूकें, वहां बाइक पर पहुंची बस्तर की ‘अफसर बिटिया’, अबूझमाड़ में प्रशासन की वापसी

 

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

 जगदलपुर। अबूझ पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक जगह आकर सड़क अचानक खत्म हो जाती है। आगे सिर्फ पगडंडी बचती है। न कोई निशान, न नेटवर्क, सिर्फ उफनते नाले, खड़ी चढ़ाइयां और जंगल का सन्नाटा। इसी खामोशी को चीरती मोटरसाइकिलें आगे बढ़ती है, जिनमें से एक पर सुरक्षा बल के जवान के पीछे बैठी हैं नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन और साथ ही सीईओ आकांक्षा खलखो।

यह कोई सामान्य दौरा नहीं, बल्कि उस इलाके में प्रशासन की वापसी है, जहां दशकों तक बंदूक का कानून था।जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर यह सफर पक्की सड़क से शुरू होकर कच्चे रास्तों में सिमटता है और गारपा के बाद पूरी तरह पगडंडियों में बदल जाता है।

इसके बाद करीब 50 किलोमीटर तक पत्थरों, ढलानों और जोखिम भरे मोड़ों के बीच आगे बढ़ना पड़ता है। यही अबूझमाड़ है, जिसे लंबे समय तक देश का सबसे दुर्गम और अप्रवेश्य क्षेत्र माना जाता रहा। कदेर, काकुर और ओरछापाल जैसे गांव कभी माओवादियों के गढ़ रहे, जहां ‘जनताना सरकार’ के नाम पर समानांतर सत्ता चलती थी। फैसले बंदूक की नली से तय होते थे।

2011 में दंतेवाड़ा जिले के गीदम नगर के थाने को माओवादियों ने बारूदी विस्फोट कर ध्वस्त कर दिया था, नम्रता उसी गीदम से निकलकर आईएएस अधिकारी बनी और अब बस्तर में ही सेवा दे रही हैं। घोर माओवाद प्रभावित सुकमा में जिला पंचायत सीईओ के बाद अब वे नारायणपुर में कलेक्टर है।

माओवादी नेतृत्व के प्रमुख चेहरे-गणपति, बसव राजू, भूपति, देवजी, गुडसा उसेंडी, कोसा और रुपेश, इन्हीं जंगलों से अपनी रणनीतियां संचालित करते थे। यहां उनके अपने स्कूल भी चलते थे, जहां अक्षर ज्ञान के साथ हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

जहां ‘जनताना राज’ था, वहां भरोसे की आहट

अब तस्वीर बदल रही है। ओरछापार में अधूरे प्रधानमंत्री आवासों के बीच निरीक्षण के दौरान कलेक्टर नम्रता जैन ने स्पष्ट कहा कि काम समय पर पूरा होना चाहिए। यह केवल निर्माण की समीक्षा नहीं, बल्कि उस भरोसे की शुरुआत है, जो इस क्षेत्र में पहली बार बन रहा है। कभी ‘जनताना पट्टे’ बांटने वाली जमीन पर अब प्रशासन का शिविर लगा, जहां करीब 100 ग्रामीण पहुंचे और 60 लोगों के आधार कार्ड बनाकर पहली बार उनकी पहचान सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज की गई।

ग्रामीण सोनासाय बताते हैं कि पहले यहां माओवादियों का राज था, लेकिन अब माहौल बदल चुका है। ग्रामीणों ने स्कूल, आंगनबाड़ी और गांव में ही राशन उपलब्ध कराने की मांग रखी, क्योंकि अब तक उन्हें 60 किलोमीटर दूर सोनपुर तक जाना पड़ता था। कलेक्टर ने मौके पर ही कुछ बच्चों का आश्रम स्कूल में दाखिला, एक घर में आंगनबाड़ी शुरू करने और गांव तक राशन पहुंचाने की व्यवस्था के निर्देश दिए। हैंडपंप से गंदा पानी आने की शिकायत पर अगले ही दिन टीम पहुंची और समस्या दूर कर दी गई।

अबूझमाड़ में बदलाव की नई कहानी

करीब 4000 वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ के इस क्षेत्र में 200 से अधिक गांव हैं, जिनमें कई अब भी पूरी तरह सर्वे में दर्ज नहीं हैं। माड़िया गोंड जनजाति का जीवन लंबे समय तक जंगल और परंपराओं के बीच सीमित रहा, जहां प्रशासन की पहुंच लगभग नहीं थी। यही अलगाव माओवाद के लिए मजबूत आधार बना। हाल के वर्षों में सुरक्षा अभियानों और आत्मसमर्पण की घटनाओं ने माओवादी ढांचे को कमजोर किया है।

Related Articles

Back to top button