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‘मम्मी-पापा, मेरी तुलना दूसरों से मत कीजिए..’ बच्चों के मन में चल रहे इस द्वंद्व को समझें, कहीं देर न हो जाए!

 

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भागदौड़ भरी इस दुनिया में जहां सफलता का पैमाना सिर्फ ‘ग्रेड्स’ और ‘रैंक’ बनकर रह गया है, वहां हमारे बच्चे एक अनजाने दबाव में जी रहे हैं। स्कूल का बस्ता तो भारी है ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा भारी वह उम्मीदें हैं जो समाज और परिवार उन पर लाद देते हैं। अक्सर बच्चे अपने कमरे के बंद दरवाजे के पीछे बहुत कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन डर और झिझक के कारण खामोश रह जाते हैं।

अगर आप एक अभिभावक हैं, तो अपने बच्चे के मन की इन 5 अनकही परतों को समझना आपके लिए बेहद जरूरी है:

1. “मेरी अपनी एक अलग पहचान है, तुलना का अंत कीजिए”

जब हम किसी दूसरे बच्चे की सफलता का उदाहरण अपने बच्चे को देते हैं, तो हमें लगता है कि हम उसे ‘मोटिवेट’ कर रहे हैं। लेकिन हकीकत में, बच्चा अंदर से टूट रहा होता है। हर टीनेजर का मन कहता है “मम्मी-पापा, मैं शर्मा जी का बेटा नहीं हूँ। मुझमें अपनी खूबियाँ हैं, शायद मैं गणित में कमजोर हूँ पर संगीत में बेहतर। प्लीज, मेरी तुलना करके मेरी काबिलियत पर सवाल मत उठाइए।

2. “रिपोर्ट कार्ड मेरा भविष्य तय नहीं करता”

अंकों की दौड़ ने बच्चों को एक ‘मार्क्स मशीन’ बना दिया है। कम नंबर आने पर बच्चा पहले से ही डरा होता है, ऐसे में माता-पिता की नाराजगी उसे डिप्रेशन की ओर धकेल सकती है। बच्चा बस इतना चाहता है कि परीक्षा के बाद आप उससे यह न पूछें कि “कितने आए?”, बल्कि यह कहें— “तूने मेहनत की, वही काफी है। अंक चाहे जो हों, मैं हमेशा तेरे साथ हूँ।”

 

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