Sunday, February 5, 2023
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“बस्तर के लोगों पर पुलिस व सुरक्षाबल द्वारा किए जा रही हिंसा, गैर कानूनी रूप से स्थापित किए जा रहे सुरक्षा कैम्प व मानवाधिकारों के उल्लंघन” पर अनेक जनसंगठनों द्वारा निंदा

रायपुर,3जनवरी 2023। रायपुर प्रेस क्लब में आयोजित प्रेसवार्ता में सोनी सोरी, हिमांशु कुमार सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि मूलवासी बचाओं मंच बस्तर संभाग, पीपल्स युनियन फार सिविल लिबर्टीज़ (PUCL), व छत्तीसगढ़ राज्य के अन्य जनसंगठन, छत्तीसगढ़ बस्तर के लोगों पर लगातार पुलिस व सुरक्षाबल द्वारा किए जा रही हिंसा, गैर कानूनी रूप से स्थापित किए जा रहे सुरक्षा कैम्प व मानवाधिकारों का लगातार किए जा रहे उल्लंघन की कड़ी निंदा करती है।

दिसम्बर 2022 में ही ऐसे कई जगह शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन चल रहे है जिस पर पुलिस व सुरक्षाबलों ने लोगों की मारपीट व गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया है व गिरफ्तार किया है या – 18 दिसंबर 2022 ग्राम पंचायत कुंदेड़ में 2 परिवारों की 10 एकड़ उपजाऊ जमीन जबरन छीनकर नया पुलिस कैंप स्थापित किया जा रहा है जहाँ मूलवासी
बचाओ मंच के बयान में बताया गया है कि वहाँ के पंचायत में फर्जी ग्राम सभा किया गया जिसमें जिला प्रशासन की ओर से ग्राम सभा को 5 लाख रुपये व सरपंच को एक लाख रुपया देने की बात पुलिस जवानों के द्वारा कहीं गयी है मगर सरपंच इस बात को नकार रहे है. 22 दिसंबर, 2022 को फर्जी ग्राम सभा के विरोध में भंडाफोड़ करते हुए धरना
पर बैठे 16 ग्रामीणों को पुलिस जवानों ने मार-पीट किया।

वैसे ही बीजापुर जिले के पुसनार गाँव में स्थापित किए जाने वाले कैम्प के खिलाफ दहाँ के सेकड़ों गांव वाले धरने पर बैठे है।15 दिसम्बर के देर रात को सैकड़ों की संख्या में पुलिस व सुरक्षाबल पहुँचकर रातो-रात बिना ग्रामसभा की अनुमति से जबरदस्ती कैम्प खड़ा कर दिया व बुर्जी गाँव के धरनास्थल में प्रदर्शन करने वालों को बेहरामी से मारपीट की. कई बुजुर्ग लोगों को भी गम्भीर चोट पहुँचा. कईयों को झूठे केसों में फसाकर उनको हिरासत में ली गई। मूलवासी बचाओं मंच के विज्ञप्ति में उन्होंने बताया है कि पीड़ितों की स्थिति गंभीर है व उनके इलाज के लिए किसी भी जनप्रतिनिधि की सहायता नहीं मिल रही है. इन सब घटनाओं के संदर्भ में मूलवासी बचाओं मंच ने एक न्यायिक जाँच की माँग की है।

धरना स्थल पर पहुंचने से सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी रोका जा रहा है. 24 दिसम्बर को सोनी सोरी जी व पत्रकार लिंगाराम कोडोपि को रोका गया. उनको पास के एक गाँव में रात बिताना पड़ा व लगातार उनको वहाँ से निकलने के धमकियाँ दी गयी, पूर्व विधयस्क मनीष कुंजाम को भी घटना स्थलओ तक पहुंचने से रोका गया।

छत्तसीगढ़ की कांग्रेस सरकार बस्तर में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर आवाज़ उठाकर वहाँ की जनता का वोट जीतकर सत्ता में आई है – यह वादे देते हुए कि बस्तर की आदिवासी जनता के अधिकारों का सुरक्षा करेंगे- चाहे वो विस्थापन के खिलाफ हो या जेल में विचाराधीन कैदी की रिहाई की बात हो या फिर बढ़ते सैन्यिकरण व पुलस व सुरक्षाबल द्वारा आदिवासी जनता पर की जा रही हिंसा पर रोक लगाने की हो. लेकिन जब कोंग्रेस सत्ता में आई तो जगह जगह पुलिस कैंप गैर कानूनी रूप में बनाई जा रही है और लगातार वहाँ के आदिवासियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है फर्जी मुटभेड़, विस्थापन, मारपीट, फर्ज़ी केस में गिराफ्तारियाँ और पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के आने-जाने पर रोक टोक लगातार बढ़ रही है।

पिछले 2 सालों में दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कई जिलों में जगह जगह आंदोलन हो रहीं हैं. सड़क निर्माण को कारण बताते हुए हर कुछ किलोमीटर के दूरी पर छत्तीसगढ़ सरकार सुरक्षा कैंप खड़ा कर रही है जिसका लोगों द्वारा जोरदार विरोध की जा रही है. जगह जगह गाँववालों ने अपना संवैधानिक हकम की माँग की है कि बिना ग्रामसभा के अनुमति से कैंप नहीं बन सकती. हर आंदोलन में पुलिस व सरकार ने बहुत बहरामी से गाँवालों व आंदोलनकर्ताओं पर खुलेआम हिंसा की है- सिलगेर के आन्दोलन में पुलिस के गोलियों से 3 लोग मारे गए व सेकड़ों लोगों की मारपीट हुई है. वैसे ही पुसनार, बेचापाल, बेचाघाटी, बुर्जी, नम्बीधारा, सिंगाराम, गोमपाड़, गोंडेरास आदि के आन्दोलनों में कई लोगों पर लाठीचारज, मारपीट, धमकी व गैर कानूनी तरीके से हिरासत में ली गई है. हर आंदोलन में बस्तर व बाहर से पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं को जानें पर रोक लगाई गई है या कई रुकावटें खड़ा गई है. युवा नेतृत्व के तहत संभाग के सभी जिलों को शामिल करते हुए मूलवासी बचाओ मंच की स्थापना सिलगेर गोलीकांड के तुरंत बाद मई 2021में की गई. मंच ने पिछले डेढ़ साल में कई बयान, विज्ञप्ति, चिट्ठी जारी की है उनके प्रतिनिधि ने सरकार व प्रशासन के साथ कई बार आमने सामने मुलाकात करके वार्तालाप की कोशिश भी की है उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से लेकर हर जिले के कलेकटर से मुलाकात करके गाँववालों के लोकतांत्रिक मांगों को रखा है।

सुरक्षा कैंप का बिना ग्रामसभा के अनुमति से स्थापित किया जाना न केवल गैर-सम्वैधानिक है बल्कि वहाँ के गाँववालों के लिए बहुत ही खतरनाक सारकेगुड़ा से लेकर पेद्दागेल्लुर तक न्यायिक जाँच व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कई बार स्वीकारा है पुलिस व सुरक्षाबलों द्वारा निहत्ते गाँवाले (बच्चे सहित) पुलिस द्वारा मे गए हैं, कई महिलाओं का बलात्कार किया गया है, घरों का लूटपाट हुआ है व वहाँ के सैंकडों आदिवासियों को उत्पीडित किया गया है – बढ़ते सैन्यिकरण के आड़ में गाँववालों को रोज़ इस खतरे व डर के माहौल में जीना पड़ता है. इसी के चलते बस्तर की आदिवासी जनता अपने लोकतांत्रिक संवैधानिक हक व मानवाधिकार की सुरक्षा के लिए जगह जगह कैम्प का शांतीपूर्वक विरोध कर रही है।

छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा एक तरह से लगातार आदिवासियों पर पुलिस की हिंसा व उनके मानवाधिकारों का हनन किया जाना व इस तरह से लगातार लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का कुचले जाने की घोर निंदा करते है।

दिसम्बर के महीने में लगातार शांतिपूर्ण आंदोलनों को रात के अंधेरे में बिना बातचीत के दमकारी तरीकों से बस्तर संभाग के जिलों में 18 पुलिस कैम्प स्थापित किये गए। इस तरह से पुलिस कैम्पों को बिना ग्रामसभा की अनुमति और निजी जमीन मालिक के अनुमति के बस्तर संभाग में स्थापित करना पेशा कानून का उल्लंघन हैं, एक तरफ सरकार पेशा कानून देकर लोगों से वाह वाही ले रही हैं और दूसरी ओर उसी कानूनी प्रक्रिया व लोकतांत्रिक ढांचे को हानि पहुंचा रही हैं।

बस्तर संभाग में जब भी नया पुलिस कैम्प खुला हैं तब-तब संयुक्त फोर्स ने आदिवासियों की फर्जी नक्सल मुठभेड़ दिखाया हैं। फर्जी मुठभेड़ के साथ साथ हत्या करने के उपरांत आदिवासियों को शव का अंतिम संस्कार आदिवासी रीती रिवाज से करने नहीं दिये, हाल ही में भैरमगढ़ क्षेत्र के तिम्मेनार गाँव मे एक आदिवासी युवक की जिला सुरक्षा बल (DRG) के जवानों द्वारा हत्या किया गया और शव को डीजल डालकर जलाया गया हैं।

बस्तर संभाग के अंदरूनी क्षेत्रों में आदिवासीयों द्वारा शांतिपूर्ण आंदोलने आज भी पुलिस कैम्पो के विरोध में चल रहे हैं। उन आन्दोलनो के आंदोलनकारियों को तरह तरह के धमकियां स्थानीय पुलिस प्रशासन के द्वारा व पुलिस जवानों द्वारा दिया जा रहा हैं। धमकियों में जिला बीजापुर के बुर्जी आंदोलनकारियों के साथ जो पुलिस ने बर्बरता किया हैं उसी का उदाहरण देकर अन्य जगह चल रहे आंदोलकारियों को धमकाया जा रहा हैं।
इन जनसंगठनों की राज्य सरकार से मुख्य मांगें हैं कि :

आन्दोलनकर्ताओं की मांग अनुसार सरकार व प्रशासन उनसे चर्चा करके लोकतांत्रिक तरीके से हल ढूंढे।

जबरन दमनकारी तरीके से लगाए गए पुलिस व सुरक्षा कैंप हटाए जाए।

जिन लोगों को पुलिसी हिंसा के कारण चोटें लगी हैं उनको तुरंत स्वास्थ सेवाएँ व इलाज प्रदान किया जाए।

सिलगेर में पुलिस कैंप लगाई जाने केलिए जो जमीन लिया गया है उसके मुवावजा और आंदोलन के बाद मारे गए ग्रामीण की जांच के लिए जो कमिटी गठित की गई है उसके रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए।

वर्तमान में बुर्जी व अन्य धरनास्थलों में बड़े तैनात में मौजूद पुलिस व सुरक्षाबल को तुरंत हटाया जाए।

सामाजिक कार्यकर्ताओं व पत्रकारों के आने जाने पर रोक व रुकावटें बंद करके उनको अपने लोकतांत्रिक हक से बस्तर के सभी इलाकों में जाने की स्वतंत्रता रहे।

जगह जगह के आन्दोलनकर्ताओं व अन्य ग्रामीणों पर अपना लोकतांत्रिक विरोध जताने के कारण जो फर्ज़ी केस में फसाया गया है उन सब पर लगे फर्ज़ी केस तुरंत वापिस लिया जाए।

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