Thursday, December 8, 2022
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अब नैरेटिव टेररिज्म—वाह विश्व गुरु वाह!


व्यंग्य: राजेंद्र शर्मा

नैरेटिव टैररिज्म यानी हिंदी में बोलें, तो आख्यान आतंकवाद का नाम किसी ने सुना था? हमने भी पहले कभी नहीं सुना था। आज सुबह ही अखबार में सुना, बल्कि पढ़ा और अपना ज्ञानवर्द्धन किया।

जम्मू-कश्मीर में स्टेट इन्वेस्टीगेटिंग एजेंसी उर्फ सिआ ने, जाहिर है कि मोदी के आशीर्वाद से तथा शाह साहब की प्रेरणा से इस नये जुर्म की और वह भी आमूली-मामूली नहीं, बाकायदा आतंकवाद के जुर्म की खोज की है। और यह कोई लाइब्रेरी या लेबेरेटरी वाली खोज भी नहीं, एकदम जमीनी या प्रैक्टीकल खोज है।

राज्य की इस खास तफ्तीश एजेंसी ने वेब पत्रिका, कश्मीर वाला के संपादक, फहद शाह और कश्मीर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आफ फर्मास्यूटिकल साइंसेज के शोधार्थी, आला फाजिली को ठीक इसी ‘आख्यान आतंकवाद’ का अभियुक्त बनाया है। वृहस्पतिवार को सिआ की चार्जशीट ने जम्मू-कश्मीर में एक अदालत को, आतंकवाद की इसी नयी किस्म की अपनी खोज के बारे में बताया। जैसे पहले जेहाद की तरह-तरह की किस्में भारत में ही खोजी थीं, लव जेहाद से लेकर, कोरोना जेहाद वगैरह से होते हुए आईएएस जेहाद तक, अब आतंकवाद की भी और नयी किस्में खोजे जाने का रास्ता खुल गया है।

खैर! इस शुक्रवार को पूरा जम्मू-कश्मीर आतंकवाद की इस नयी खोज के बारे में जान गया और शनिवार को पूरा देश। नया हफ्ता शुरू होने तक, पूरी दुनिया हमारी इस नयी खोज के बारे में जान ही लेगी। और खोज भी कोई छोटी-मोटी नहीं, सिर्फ टॉप लेवल के पढ़े-लिखों वाले आतंकवाद की है। न गोली, न बम, न बंदूक, सिर्फ कागज-कलम और रिसर्च वाले आतंकवाद की खोज!

वैसे अर्बन नक्सल या अर्बन माओवादी या टुकड़े-टुकड़े गैंग की खोज तो, मोदी जी के राज में आने के साथ ही कर ली गयी थी। उसके मामलों में भी खासकर पढ़े-लिखों को ही जेल वगैरह में डाला गया था। फिर भी, बाकी दुनिया मोदी जी के राज की इस नयी खोज से ठीक से कनेक्ट ही नहीं कर पा रही थी। पर अब वह बाधा भी नहीं रहेगी। नैरेटिव हो या कुछ और, आतंकवाद चाहे जैसा भी क्यों न हो, उसे दुनिया झट से पहचान जाएगी। पब्लिक को उसकी बदहाली के आख्यान सुना-सुनाकर भडक़ाने वालों को, कौन सी सरकार आतंकवादी नहीं मानना चाहेगी! यानी आख्यान आतंकवाद की हमारी खोज तो हिट होकर रहेगी।

और अब तो प्रो. साईबाबा को हाई कोर्ट के फैसले के बाद भी जेल से बाहर न निकलने देकर, सुप्रीम कोर्ट ने इस मानवता के लिए बहुत ही जरूरी खोज पर अपनी मोहर भी लगा दी है। सुप्रीम जस्टिस साहब ने तो कहा भी है कि ‘दिमाग ही सबसे खतरनाक है। आतंकवादियों या माओवादियों के लिए दिमाग ही सब कुछ है।’ यानी बम-बंदूक तो सब बहाने हैं, असली खतरा दिमाग चलाने वालों से है। और इलाज तो एकदम सिंपल है। फिल्म ‘सत्या’ ने पहले ही बता दिया था: ‘‘गोली मारो भेजे में, भेजा शोर करता है’’! भारत ने प्राचीन काल में दुनिया को शून्य दिया था और मोदी काल में सारी दुनिया की सरकारों को आख्यान आतंकवाद का हथियार।

वह दिन दूर नहीं है, जब सारी दुनिया की सरकारें इस खोज के लिए, अपनी-अपनी भाषाओं में थैंक यू मोदी जी गाएंगी। अब तो विरोधियों को भी मानना ही पड़ेगा कि अमृतकाल लगते ही मोदी जी ने भारत को विश्व गुरु बना दिया है। आखिर, अमरीका ने इतनी मुश्किल से आतंकवाद खोजा था, उसकी नयी किस्म कोई यूं ही नहीं खोज लेता!

अब प्लीज यह कोई नहीं कहे कि एक ही खोज से कोई विश्व गुरु नहीं बन जाता है। हमें कोई विश्व गुरु बनने-बनाने की जरूरत नहीं है। विश्व गुरु बनने की जरूरत तो उसे होगी, जो नया-नया विश्व गुरु बनने चला हो। हम तो बने-बनाए विश्व गुरु हैं। हम तो हमेशा के विश्व गुरु हैं। हम तो तभी से विश्व गुरु हैं जब शून्य के आगे-पीछे हमारे ऋषियों ने विमान बनाए थे, हमारे मुनियों ने इंसानी धड़ों पर जानवरों के सिर लगाए थे और हमारे तपस्वियों ने एक-एक अंडे से सौ-सौ टेस्ट-ट्यूब बच्चे पैदा कराए थे। हमारे आविष्कार भले ही पश्चिम वाले चुरा ले गए हों, भले ही इस चोरी के बल पर पश्चिम वालों ने बाद में हमें गुलाम बना लिया हो, पर विश्व गुरु का अपना वह पुराना आसन, भारत ने किसी को चुराने नहीं दिया।

सच पूछिए तो हमारे घेरे होने की वजह से ही, विश्व गुरु का आसन चूंकि कभी खाली ही नहीं हुआ था, इसीलिए तो और किसी ने कभी विश्व गुरु होने का दावा भी नहीं किया। और तो और हम भी इसे भूले बैठे थे, जब तक मोदी जी ने हनुमान जी की तरह चेताया नहीं कि हम तो विश्व गुरु हैं। ऐसा परमानेंट विश्व गुरु क्या सिर्फ एक ही आविष्कार के लप्पे से विश्व गुरु के आसन की दावेदारी की बात सोच सकता है; फिर चाहे वह एक आविष्कार, नैरेटिव टैरर जैसा फाडू ही क्यों नहीं हो!

और भी बहुत हैं हमारे विश्व गुरु होने के इशारे। विश्व भूख सूचकांक ही ले लो। जब से मोदी जी ने वही-वही करने का संकल्प लिया है, जो सत्तर साल में नहीं हुआ था, तब से भूख सूचकांक पर भारत ऊपर से ऊपर ही चढ़ता जा रहा है। पर 2014 तक क्यों जाएं, पिछले साल ही दुनिया के कुल 116 देशों में भारत 101वें नंबर पर था, इस साल ऊपर चढ़कर 107 वें नंबर पर पहुंच गया है। आस-पड़ौस के सारे देश पीछे छूट गए हैं। चीन-वीन तो खैर कोसों दूर हैं ही, पर बांग्लादेश, नेपाल, भूटान तक, सब पीछे छूट गए हैं। बस एक अफगानिस्तान ही है जो अब भी हमारी टक्कर में है यानी भूख में हमसे भी दो कदम आगे है।

वैसे अगर मोदी जी ने कोरोना के टाइम में 80 करोड़ लोगों को हर महीने पांच किलो अनाज की मुफ्त की रेवड़ी नहीं दी होती, तो आराम से हमने अफगानिस्तान को भी बुरी तरह पछाड़ दिया होता। वैसे, आज भूख में दुनिया भर में एक नंबर पर न सही, पर हम एक नंबर के रास्ते पर तो हैं ही। विश्व गुरु हरेक चीज में एक नंबर हो, यह भी जरूरी तो नहीं; कई बार नंबर एक बनने के रास्ते पर भी तो हो सकता है। फिर भूख सूचकांक में न सही, भूखों की संख्या बढ़ाने में तो हम दुनिया में नंबर वन हैं ही। इसमें तो कोई अफगानिस्तान हमारे आस-पास भी नहीं फटक सकता है।

और हमारे पास दुनिया का अमीर नंबर दो है, उसको भी तो याद कर लो। और जो हरेक सार्वजनिक दर्शन से पहले पोशाक बदलने वाला और हर वक्त अकेला कैमरे के फोकस में रहने वाला, प्रधान सेवक हमें ईश्वरीय कृपा से मिला है, उसका क्या?

और जो कॉरीडोर-कॉरीडोर, मंदिर-मंदिर, धर्मनिरपेक्ष संविधान की छतरी के नीचे लगभग हिंदू राष्ट्र बनने का अद्भुत चमत्कार हो रहा है, उसका क्या? और भी बहुत कुछ है हमें विश्व गुरु बनाने के लिए। फिर भी, नैरेटिव टेररिज्म की बात ही कुछ और है। विश्व गुरु के आसन से अब हमें कोई नहीं हिला सकता।

इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोकलहर के संपादक हैं

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