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बाघ फिर भी नहीं आया

व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

एक बादशाह था। छोटा-मोटा नहीं, बहुत बड्डा वाला बादशाह था। बादशाह था, तो जाहिर है कि उसका राज भी होगा। छोटा-मोटा नहीं, बड्डा वाला राज था। इतना बड़ा कि लोग इज्जत से उसे देश कहते थे। बादशाह था, उसका राज भी था, तो जाहिर है कि प्रजा भी होगी। थोड़ी-मोड़ी नहीं, बहुत ज्यादा-सी प्रजा थी। बादशाह था, राज था, प्रजा थी, तो जैसे बदशाह के रहने के लिए किला, राजमहल वगैरह होंगे, वैसे ही प्रजा के रहने के लिए शहर, कस्बे, गांव वगैरह भी होंगे। दस-बीस नहीं, बहुत-बहुत सारे शहर, कस्बे और गांव थे। पर वह बादशाह ही क्या, जिसके राज में जंगल नहीं हो। आखिर, जंगल ही नहीं होगा, तो जंगली जानवर कहां होंगे? और जंगली जानवर नहीं होंगे, तो बादशाह बोरियत दूर करने के लिए, तफरीह करने और शिकार खेलने कहां जाएगा? माना कि बादशाह लोगों को, शहरों-गांवों में भी शिकार करने के मौके मिल ही जाते हैं, पर वह शिकार काम के हिस्से में आता है और बोरियत के खाते में जाता है। शहर के शिकार में, वह मनोरंजन वाली बात कहां! सो बादशाह के राज में जंगल भी था। छोटा-मोटा नहीं, बहुत बड्डा वाला जंगल।

और बड्डे वाले जंगल में ढेर सारे जंगली जानवर बाघ, भालू, हाथी, लक्कड़भग्गा, बाहरसिंघा, चीतल, जंगली सुअर, वगैरह। और एकाध जो नहीं थे या नेहरू जी की गलतियों की वजह से पैदा होना बंद होने से खत्म हो गए थे, जैसे चीता वगैरह, उन्हें भी बादशाह ने एक दूसरे बादशाह के जंगल से खरीद कर मंगवाया था और अपने जंगल को, चीता-हीन से चीता-युक्त कराया था। यानी बादशाह के राज में खूब बड़ा और सब तरह के जानवरों से भरा-पूरा जंगल था। जंगल इतना बड़ा था कि बादशाह के दोस्त और दरबारियों के लिए दिन-रात कटता था, फिर भी जंगल छोटा नहीं होता था। और जंगल जानवरों से भरपूर था, क्योंकि जंगल काटने की तो इजाजत थी, पर जानवर काटने पर रोक थी। जंगल से शहर तक जानवर काटने पर रोक थी, बादशाह शाकाहारी जो था। शाकाहारी भी ऐसा पक्का कि सुनते हैं कि परदेश से मंगवाए चीतों को भी जब शाकाहारी बनने की कड़ी ट्रेनिंग दी जा रही थी, तो उनमें से एक ने तो कद्दू खाने से तंग आकर खुदकुशी ही कर ली। उसके बाद ही परदेसी मेहमानों के लिए, वो चाहे इंसान हों या जानवर, शाकाहार के कानून में कुछ ढील दी गयी।

पर बादशाह, बादशाह था। मांसाहारी नहीं था, तो क्या हुआ, बादशाह शिकार का शौकीन था। शिकारियों वाली ड्रैस का शौकीन। शिकारियों वाली जीप का शौकीन। शिकारियों वाली मुखमुद्राओं का शौकीन। और हां! जानवरों को शूट भी करने का शौकीन; मगर बंदूक से नहीं कैमरे से शूट करने का। बादशाह का प्यार ही था, जो कैमरे से शूटिंग में व्यक्त होता था। तभी वह सब से ज्यादा अपने आप को कैमरे से शूट करता था — सेल्फी में! उससे जरा सा कम, पर वह जंगल के जानवरों को भी कैमरे के पीछे खूब प्यार करता था। और कैमरे से जंगली जानवरों से अपने प्यार करने की तस्वीरों से तो उससे भी ज्यादा प्यार करता था। तो बादशाह जब अपनी प्रजा को मुफ्त राशन के अपने प्यार की याद दिला-दिलाकर बोर हो गया, तो जायका बदलने के लिए उसने, कैमरे से शूटिंग करने के लिए जंगल की ओर रुख किया।

बादशाह, कैमरे से शिकार करने चला था, पर था तो बादशाह। बादशाह, कैमरे के पार से जानवरों को देखने चला और जंगल के जानवर बादशाह को देखने चले। बादशाह चला, तो पूरे लाव-लश्कर के साथ चला। कैमरे से शूट करने चला, पर दाएं-बाएं, आगे-पीछे बंदूक से शूट करने वालों का काफिला लेकर चला। जंगल के रास्ते पर जीप पर चला, पर एक-एक मोड़, एक-एक घुमाव, शहर में सुरक्षा के एक्सपर्टों के कहे के हिसाब से चला। डरते-डरते ही आए पर भालू, सुअर, लक्कड़भग्गा, चीतल, बारहसिंघा, लोमड़ी, खरगोश और हाथी तक, सब आए। बादशाह के दर्शन करने और खुद को बादशाह को दिखाने आए। बस बाघ ही नहीं आया। पहले किलोमीटर तक नहीं आया। दूसरे तक नहीं आया। तीसरे, चौथे, पांचवे तक नहीं आया। जंगल में पूरे 22 किलोमीटर बादशाह का रोड शो चला, पर बाघ नहीं आया। बादशाह से इंतजार कराया, पर बाघ नहीं आया। बादशाह ने तुर्शी से कहा- हो गया। और काफिला शहर के लिए लौट चला!

महल लौटने के आधा घंटे बाद भी जब बादशाह की एक भी सैल्फी लोड नहीं हुई, दरबार में हडक़ंप मच गया। क्या हुआ — क्या हुआ का शोर, दरबार से जंगल तक दौड़ गया। खुफिया तंत्र ने भी झट पता कर के बता दिया — बाघ सलाम करने नहीं आया! दरबारियों ने एक स्वर से फटकार लगायी–बाघ की ये हिम्मत! दुनिया के सबसे बड़े बादशाह की शान में ऐसी गुस्ताखी! बादशाह, तुम्हारे दरवाजे तक आया, पर बाघ रिसीव करने निकलकर दरवाजे तक नहीं आया। शर्म-शर्म के नारों से दरबार गूंज उठा। पर सभी वफादारों ने असंतोष जताया – इससे क्या होगा? पता लगाया जाए, यह हुआ कैसे? गृहमंत्री ने खुफिया एजेंसी को फरमान दिया — पता करो यह षडयंत्र किस ने रचा है? कानून मंत्री ने भरोसा दिलाया — षडयंत्रकारियों को ऐसी सजा दिलाएंगे कि जंगल और शहर, सब हमेशा याद रखेंगे।

खोजते-खोजते षडयंत्र खोजियों ने जीप ड्राइवर को जा पकड़ा। जीप ड्राइवर ने कहा, आंखों पर पट्टी बांधकर सुरक्षावालों ने जिधर चलवाई, उधर गाड़ी चलायी। कौन आया, कौन नहीं आया, मैंने ना कुछ देखा, ना सुना; मेरा क्या कसूर? सुरक्षा वालों ने भी हाथ झाड़ दिए — जो किया, नियम से किया। बाकी शहर हो या जंगल, हम नहीं देखते। घूम-फिरकर बात, वन तथा वन्य जीव मंत्री तक पहुंच गयी। मंत्री जी को अपनी कुर्सी की फिक्र हुई। उन्होंने झट जंगल में मुनादी करा दी — दुनिया के सबसे लोकप्रिय बादशाह की शान में गुस्ताखी हुई है। राजद्रोह की यह साजिश रचने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। जंगल में बुलडोजर नहीं चलने से षडयंत्रकारी बच नहीं सकते। बंदूक से शिकार की ही तो मनाही है, एनकाउंटर की नहीं! बादशाह सलामत फिर भी जान बख्श भी सकते हैं, पर बाघ को पहले लिखित में माफी मांगनी होगी!

चार दिन की खोज-बीन के बाद, एनकाउंटर-विशेषज्ञों को गहरे जंगल में एक झाड़ी से चिट्ठी मिली, बाघों के सरदार के पंजे की छाप के साथ। हम जा रहे हैं, जहां बाघ को बाघ की इज्जत मिले। आप और आपके बादशाह को, इम्पोर्टेड चीते ही मुबारक!

अगले दिन जवाब में जंगल ने नयी मुनादी सुनी – अब जंगल में भी अमृतकाल आएगा, अब से चीता ही बाघ कहलाएगा! अब से जिसने चीते को चीता कहा, राजद्रोह में सीधे जेल जाएगा।

*(इस व्यंग्य के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)*

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