3414 मुठभेड़, 1,573 माओवादी मारे गए, 1318 जवान बलिदान, बस्तर की धरती एक अलग ही गणतंत्र कथा कहती है

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
जगदलपुर। गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब देश संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात करता है, तब बस्तर की धरती एक अलग ही गणतंत्र कथा कहती है। यहां सुरक्षा बल सिर्फ वर्दीधारी जवान नहीं रहे, बल्कि गणतंत्र के असली गण बनकर उभरे।

माओवाद के विरुद्ध यह लड़ाई कोई एक-दो साल की नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय से चली आ रही है। छत्तीसगढ़ के गठन (वर्ष 2000) के बाद यह संघर्ष और तीखा हुआ।
वर्ष 2001 से 21 दिसंबर 2025 तक 3,414 मुठभेड़ें
आंकड़े इसकी भयावहता को बयान करते हैं कि 2001 से 21 दिसंबर 2025 तक 3414 मुठभेड़ें हुईं। 1,573 माओवादी मारे गए, 1318 सुरक्षा बलों के जवान बलिदान हुए और 1821 निर्दोष नागरिक माओवादी हिंसा का शिकार बने।
ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की कीमत हैं। शुरुआती दौर आसान नहीं था। नागा बटालियन और सीआरपीएफ की तैनाती के बावजूद सुरक्षा बल गुरिल्ला युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर माओवादियों ने बारूदी सुरंग और आइईडी को हथियार बनाया।
2005 में सलवा जुड़ूम के दौर में हिंसा चरम पर पहुंची
ताड़मेटला में 76, बुर्कापाल में 25 जवानों का बलिदान और रानीबोदली में 53 जवानों को आग में झोंकने जैसी घटनाएं बस्तर के इतिहास पर गहरे घाव छोड़ गईं। 2005 में सलवा जुड़ूम के दौर में हिंसा अपने चरम पर पहुंची।
आदिवासी समाज दो धड़ों में बंटा। एक ओर माओवादी बंदूक के साथ, दूसरी ओर डंडा थामे आम ग्रामीण। माओवादियों ने जनअदालतों के नाम पर शिक्षक, सरपंच, सचिव, महिलाएं और बच्चों तक की हत्याएं की। यह दौर गणतंत्र के लिए सबसे कठिन परीक्षा थी।
अमित शाह का संकल्प, जवानों की आत्मशक्ति
इतिहास वहीं मुड़ता है, जहां राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत संकल्प साथ आते हैं। 2021 में टेकुलगुड़ेम हमले के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने माओवाद के समूल खात्मे का लक्ष्य तय किया। मार्च 2026 की समयसीमा के साथ। पिछले चार वर्षों में बस्तर संभाग में लगभग 135 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। सुरक्षा बल पहली बार माओवादियों के कोर एरिया में स्थायी रूप से उतरे।
वर्ष 2025 इस लड़ाई का निर्णायक अध्याय बना
जिन इलाकों में कभी माओवादी कदमों की आहट से डर लगता था, वहां आज जवानों की गश्त भरोसे का संदेश देती है। 3,412 हथियार और 4,367 आइईडी जब्त किए गए। वर्ष 2025 इस लड़ाई का निर्णायक अध्याय बना। माओवादी महासचिव बसवा राजू सहित 11 केंद्रीय समिति सदस्य मारे गए।



